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रविवार, 11 अप्रैल 2010

माया की माया अपरम्पार

राहुल कुमार :
माया की माया वहीं जानें...
वैसे कांशीराम भी मायावती का सही आकलन कर पाए थे तभी तो अपनी वसीयत में, बक़ौल बहन जी, यह कह गए कि गली, नुक्कड़, चौबारों पर मायावती की प्रतिमाएँ लगें.
मायावती कहती हैं कि कौन सा क़ानून जीवित लोगों की मूर्तियाँ लगाने की मनाही करता है.
सच तो है....और कौन सा क़ानून इस बात की मनाही करता है कि अपना (या अपने मार्गदर्शक का) जन्मदिन धूमधाम से न मनाया जाए.
आम करदाता को तो ख़ुश होना चाहिए कि कम से कम नज़र तो आ रहा है कि उसकी मेहनत की कमाई कहाँ जा रही है.
अन्य नेता तो इस पैसे को हज़म कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते.
मायवती की बुराइयाँ ढूँढने वाले ज़रा उनकी अच्छाइयों पर तो नज़र डालें.
हज़ार रुपये के नोटों की माला पहन कर उन्होंने संदेश दिया है कि बाग़ से फूलों को मत नोंचों.
उन्हें खिला रहने दो माला में मत पिरोओ. नोटों से काम चलाओ.
पर्यावरण की इतनी चिंता है और किसी को.
कॉंग्रेस ने महारैली को सर्कस कहा.
बताइए ऐसा कोई सर्कस देखा है जहाँ टिकट न लेना पड़े.
तो जनता अगर बिना पैसा ख़र्च किए यह सर्कस देख कर अपन मनोरंजन कर रही है तो विपक्ष के पेट में क्यों दर्द हो रहा है.
मायावती जी, बहन जी, आप यूँही फूलें फलें....नहीं शायद मुहावरा बदलना पड़ेगा....आप यूँही नोटों के हार पहनती रहें...
हम क्यों दुखी हैं...यह एक हज़ार रुपये हमारी जेब में थोड़े ही आने वाले थे...हमने तो एक हज़ार का नोट छू कर भी नहीं देखा है.
भैया, अपने सौ-सौ के नोटों को संभालो और ख़ुश रहो.

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