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शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

सहवाग का जलवा

सहवाग यानी एक ऐसा खिलाड़ी जो बल्लेबाजी के प्रचलित नियमों पर इतना दबाव डाल देता है कि वे उसी की इच्छा के मुताबिक ढलने को मजबूर हो जाते हैं. श्रीलंका के खिलाफ मुंबई में उन्होंने खड़े-खड़े जो रिवर्स पैडल शॉट खेला वह जितना सहज था उतना ही अचूक भी. क्रिकेट के व्याकरण में ऐसे शॉट का जिक्र तक नहीं मिलता मगर सहवाग ने जब इसे खेला तो यह हर तरह से सही ही लगा. उन्होंने खेलते-खेलते ही इस शॉट का आविष्कार कर डाला था.

सहवाग की असफलताओं को भी उनकी सफलताओं जितनी सरलता से समझ-समझया जा सकता है. वे असफल तब होते हैं जब उनकी लय उनका साथ छोड़ देती है. और जब ऐसा होता है तो उन्हें देखकर डर लगता है. इंच भले ही छोटी माप हो पर क्रिकेट के खेल में इसकी बड़ी भूमिका होती है. बल्ला जहां पर सबसे चौड़ा होता है वहां पर इसकी माप सिर्फ सवा चार इंच होती है जिसका मतलब यह है कि शॉट में सिर्फ दो इंच की चूक से बॉल, बल्ले का बाहरी किनारा छूते हुए बल्लेबाज को वापस पवेलियन भेजने का इंतजाम कर सकती है. ऑफ स्टंप से लेकर लेग स्टंप तक महजा नौ इंच की चौड़ाई का खेल में सर्वाधिक महत्व होता है

क्रिकेट का इतिहास बताता है कि बड़े शॉट लगाने वाले खिलाड़ियों का अहम भी बड़ा रहा है. विवियन रिचर्ड्स के विस्फोटक शॉट अपने रंग को लेकर उनके मन में गहरे दबे गुस्से की अभिव्यक्ति थे. इयान बॉथम अपने शॉट से सबको यह अहसास करवाने की इच्छा रखते थे कि वे दुनिया के बादशाह हैं. मगर सहवाग ऐसा कोई झंडा उठाकर नहीं चलते. वे किसी चीज का प्रतीक नहीं हैं. उनके लिए गेंद बनी ही इसलिए है कि उसे जम के कूटा जा सके. सीधी सी बात. इसके परे इसमें कोई भी गहरे मायने ढूंढना बेकार है.

सभी महान गेंदबाजों में एक बात समान होती है और वह है उनका याद रखने का गुण. वे बल्लेबाजों की कमियां भी याद रखते हैं और अपना हर विकेट भी. श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने टेस्ट क्रिकेट में लगभग 800 विकेट लिए हैं और उन्हें अपना हर विकेट आखिरी विकेट की तरह याद है. यही गुण महान बल्लेबाजों में भी होता है. सचिन तेंदुलकर आराम से बता सकते हैं कि 162 टेस्ट मैचों में से किसी में भी वे किस तरह आउट हुए.मगर सहवाग महानता की तरफ बिल्कुल उल्टी दिशा से बढ़े हैं. याद रखने की बजाय उनके पास भूल जाने का गुण है. न कोई दुख और न ही किसी खराब पारी या शॉट का विश्लेषण. सहवाग आज और अभी में जीते हैं. बीता कल भुला चुके होते हैं और आने वाले कल के बारे में सोचते नहीं. उनकी जगह कोई और होता तो 293 पर आउट होने के बाद दुख से सराबोर हो सकता था. मगर सहवाग कह रहे थे कि वे खुश हैं कि दो तिहरे शतकों के बाद इतना बड़ा स्कोर बनाने वाले वे अकेले बल्लेबाज हैं. इसके बाद उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसे दुनिया भर के गेंदबाज सुनकर अपना सिर धुन सकते हैं. उनका कहना था कि इस बार वे अपने तीसरे तिहरे शतक से चूक गए पर कोई बात नहीं, आगे फिर मौके आएंगे

सहवाग एक सुनामी की तरह हैं. जब वे बढ़िया होते हैं तो बहुत बढ़िया होते हैं और जब खराब होते हैं तो बहुत खराब. इसका मतलब है एक किस्म की अनिश्चितता जो उन्हें महानता की श्रेणी में जाने से रोकती रही है मगर सहवाग को इस विश्लेषण से कभी कोई मतलब नहीं रहा. वे एक सीधे इंसान हैं जिसका सीधा सा मकसद है जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा रन बनाना. टेस्ट मैचों में उनका स्ट्राइक रेट 80.44 है. रिकी पोंटिंग के मामले में यह आंकड़ा 59 और ब्रायन लारा के मामले में 60 है. सिर्फ एडम गिलक्रिस्ट ही 82 के स्ट्राइक रेट के साथ उनसे आगे हैं जिन्हें टेस्ट मैचों में शायद ही कभी नई गेंद खेलने को मिली हो.

तीन साल पहले लाहौर में 254 रन बनाने के बाद अगली 11 पारियों में वे एक भी अर्धशतक नहीं बना सके; सेंट लूशिया में 180 जड़ने के बाद अगली 12 पारियों में उन्होंने सिर्फ एक अर्धशतक लगाया और चेन्नई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 319 बनाने के बाद अगली छह पारियों तक वे एक भी अर्धशतक नहीं बना सके .सहवाग की बल्लेबाजी में एक सीधापन है जो उन लोगों को नहीं भाता जो जटिलता और रहस्यों को पसंद करते हैं. मगर उन्हें समझना चाहिए कि सादा होने का अर्थ सरल होना नहीं है. यही तो सहवाग की विशेषता है कि वे सब कुछ ऐसा बना देते हैं जो बेहद सरल दिखने लगता है. ऐसा लगता तक नहीं कि वे दुनिया के सबसे विध्वंसक बल्लेबाज हैं. बिना पैर हिलाए वे रनों का पहाड़ खड़ा कर सकते हैं.

आदर्श बल्लेबाजी के बुनियादी नियम कहते हैं कि बल्ले को सीधा रखते हुए नीचे लाकर पैर को बॉल की पिच के साथ लाइए, बल्ले और पैड को करीब रखते हुए शाट लगाइए, फिर फॉलो थ्रू कीजिए. यानी क्रिकेट खेलना पूरा हारमोनियम बजाने जैसा है जिसमें यह तय होता है कि किस धुन को बजाने के लिए किन-किन खटकों पर कब और कैसे उंगली रखनी है. मगर सहवाग और उनसे पहले जयसूर्या ने इस हारमोनियम से एक ऐसा संगीत छेड़ा जो पारी की शुरुआत करने वाले बल्लेबाजों से सुनना दुर्लभ था. सहवाग के लिए सिर्फ एक ही सुर मायने रखता है, वह है संतुलन का स्वर
इतिहास में ऐसे बल्लेबाज रहे हैं जिन्होंने अपने नियम खुद बनाए. गैरी सोबर्स को भी फुटवर्क से कोई खास मतलब नहीं था. विश्व एकादश के लिए खेलते हुए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी 254 रनों की पारी जिसे ब्रैडमैन ने भी अपने देश की धरती पर खेली सबसे शानदार पारी कहा था, वह इस मामले में भी असाधारण थी कि इसमें फुटवर्क की कोई खास भूमिका नहीं थी. तब यह तर्क दिया जाता था कि सोबर्स को इसलिए कोई कुछ नहीं कहता क्योंकि वे एक जीनियस थे

जिस तरह भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी ज्यादा रंगबिरंगी और मौलिक होती है उसी तरह उनके द्वारा खेला जाने वाला क्रिकेट भी अनूठा होता है. सहवाग इसका उदाहरण हैं जो परंपरागत नियमों पर कम ध्यान देते हुए विदेशी सरजमीं पर पहला शतक लगाने वाले भारतीय मुश्ताक अली के जैसी अंग्रेजी शैली का जरा भी लिहाज नहीं करते.

सहवाग ने खुद को तेंदुलकर की तर्ज पर ढाला और शुरुआत में वे जब टीम में आए थे तो हेलमेट पहने इन दोनों खिलाड़ियों को पिच पर देखकर बताना मुश्किल होता था कि तेंदुलकर कौन है और सहवाग कौन. शायद उन्होंने इसीलिए बाद में अपना वजन बढ़ा लिया ताकि दशर्क उन्हें ज्यादा आसानी से पहचान सकें2001 में जब सहवाग ने अपना पहला ही टेस्ट खेलते हुए सेंचुरी लगाई तो वे नंबर छह पर बल्लेबाजी कर रहे थे. चार सीरीज बाद उन्हें लॉर्ड्स में पारी की शुरुआत करने का मौका मिला जहां उन्होंने 84 रन बनाए. अगले ही मैच में उन्होंने शतक बनाया. उनके पहले छह शतकों में से पांच अलग-अलग देशों में बने हैं. यह भी दिलचस्प है कि ये मैच के पहले ही दिन बने

1980 के दशक में जब बैरी रिचर्ड्स ने कहा था कि बल्लेबाजी की तकनीक बदल रही है तो परंपरावादियों ने उनका विरोध किया था जिनका कहना था कि तकनीक कभी नहीं बदल सकती. हारमोनियम के सुर तय रहेंगे. इसके बावजूद अगर सहवाग बिना पैर हिलाए इतने रन बना रहे हैं और समय और ऊर्जा बचा पा रहे हैं तो पूछा जा सकता है कि उनकी शैली को खेल की प्रशिक्षण पुस्तिका में जगह क्यों नहीं मिलनी चाहिए
टेस्ट क्रिकेट में भारत को नंबर एक की गद्दी तक पहुंचाने में सहवाग का योगदान बेहद अहम रहा है. पिछली आठ सीरीज में उन्होंने किसी भी दूसरे बल्लेबाज की अपेक्षा ज्यादा रन बनाए हैं. पिछले 20 टेस्ट मैचों में उनका कुल स्कोर रहा है 2093. वे भारत का नेतृत्व कर चुके हैं, उन्हें टीम से हटाया जा चुका है और फिर उन्होंने शानदार वापसी भी की है. रन बनाने की उनकी रफ्तार ने अक्सर भारत को विपक्षी टीम को आउट करने के लिए पर्याप्त समय दिया है. पिछले साल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ 68 गेंदों में बनाए गए उनके 83 रनों की वजह से भारत को एक अप्रत्याशित सी जीत मिली.

मेलबॉर्न में एक बार उन्होंने एक दिन में ही 195 रन ठोक डाले और उनका कैच बिल्कुल बाउंड्री के पास पकड़ा गया. यह हैरत की बात इसलिए नहीं थी क्योंकि उन्होंने अपना पहला तिहरा शतक भी छक्का मारकर पूरा किया था. शायद वे यह कहना चाह रहे थे कि आप 195 पर हों या 295 पर, कैच होने की संभावनाएं समान ही होती हैं! सही मायने में उनसे साहस भी सीखा जा सकता है और प्रेरणा भी ली जा सकती है