शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

कहावतो में सिमटा मौसम विज्ञान

आज हम आधुनिक यंत्रों के ज़रिए भविष्य के मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं.लेकिन सदियों पहले ही मारवाड़ के लोगों ने मौसम विज्ञान का सार तुकबंदियों और कहावतों में पिरो दिया था.बड़े बुर्जुगों से कई कहावतें आपने भी सुनी होगी, इन्हे परखने पर पता चलता है कि यह संक्षेप में सार बयां करने का बरसों पुराना अंदाज था.लेकिन क्या आप जानते है कि मौसम कि भविष्यवाणी करने वाली भी लोक कहावतें हैं.

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन कहावतों पर भरोसा करते है.यहाँ के लोगों ने अपना विज्ञान लोक कहावतों और तुकबंदियो के बलबूते विकसित किया है.आज भले ही आधुनिक मशीनी यंत्रो से मौसम वर्षा, आंधी, तूफान की अग्रिम जानकारी मिल जाती है लेकिन मारवाड़ के ग्रामीण जन आज भी इन कहावतों पर विश्वास करते हैं.यह कहावतें और भविष्य और इनके आधार पर की गई भविष्यवाणियां ज्यादातर सटीक और सही भी होती है.तभी तो इन लोगों का विश्वास इतना पक्का हो गया है.

कुछ कहावतें हैं जो दिन के हिसाब से मौसम का हाल बंया करती है.जैसे

शुक्रवार री बदरी,रही शनिचर छाए।
डंक कहे है भडड्ली,वर्षा बिन न जाए ।
स कहावत के अनुसार डंक भडड्ली से कहता है- य़दि शुक्रवार को बादल आए और शनिवार तक रहें, तो समझ जाओ कि बादल बरसे बिना नहीं जाएंगे, यानी ऐसे संकेत मिलने पर बारिश का होना तय समझा जाता है.........
माह मंगल, जेठ रबी,भारदेव सन होय।
डंक कहे है भडड्ली,बिरला जिवै कोय।
इसमें बताया गया है कि माघ माह में यदि पांच मंगलवार हों, जेठ माह मे पांच रविवार औऱ भादों में पांच शनिवार हो, तो डंक भडड्ली से कहता हैभविष्य में ऐसा अकाल पड़ेगा, जिसके बाद शायद ही कोई जीवित बचे.इनके अलावा कुछ ऐसी कहावतें हैं जो हवा के रुख़ को भांपकर बारिश या अकाल पड़ने की सम्भावना की बात कहती है...
नाडा टाकंण बलद विकावण।
मत बाजे तू, आधे सावण।
जब आधे सावन में दक्षिण पूर्व की हवा चलती है, तो मारवाड़ का किसान कहता है, हे भगवान ऐसी हवा मत चल, जिससे अकाल आने की सूचना मिलती है। जिसके कारण किसान को अपना बैल बेचना पड़ जाता है....
पवन बाजे सूरयो,तो हाली,
हलाव कीम पुरयो ।
यदि उतर-पश्चिम कोण की ओर से हवा चले, तो किसान को नई ज़मीन पर हल नहीं चलना चाहिए, क्योंकि मेघ जल्दी आने वाला है.....इसी तरह मारवाड़ के किसान सूर्य और चंद्रमा के उदय होने के स्थान पर भी निर्भर रहता है.....
सोमां, सुकरां, सुरगुंरा जै चंदो उगंत।
डंक काहे है भडड्ली,जल,थल एक करंत।
यदि आषाढ मास में चंद्रमा सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार को उदय हो, तो डंक भड्डली से कहता है कि जल थल एक हो जाएंगे यानी वर्षा खूब होगी......
इन कहावतों के आधार पर मौसम का अंदाजा लगाने का क्रम बरसों से चल रहा है और शायद आगे भी सदियों तक चलता रहेगा...मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यंत्रो के आने से बहुत पहले ही इस गांव के बुजुर्गों ने कहावतों में मौसम का भविष्य गढ़ दिया है। जिनकी सटीकता और प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता
सच, अद्भुत है हमारा देश।

बुधवार, 21 सितंबर 2011

धारा का सफर


जी करता है, आज एक धारा बन जाऊं,
दरिया की बाहों में बहते हुए,
सागर की गहराइयों में कहीं खो जाऊं।

न किनारों का बंधन हो, न कोई ठहराव,
बस लहरों संग नित नए सफर पर चलूं,
जहां मौन भी मुझे न छू सके,
ऐसे अनंत में कहीं विलीन हो जाऊं।

शब्दों की हलचल से दूर,
एक निर्जन सन्नाटे का हिस्सा बनूं,
जहां मेरी गूँज भी ख़ुद से अजनबी हो,
जहां समय भी मुझे पहचान न सके।

मैं बहूं, मैं बहूं, निरंतर बहूं,
ना किसी ओर ठहरूं, ना किसी में समाऊं,
सिर्फ़ एक अहसास बनकर रह जाऊं,
जिसे कोई देख न सके, बस महसूस कर पाए।

बुधवार, 7 सितंबर 2011

जनभावना की जीत

सामाजीक कार्यकर्त्ता अन्ना हजारे के द्वरा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में आखिरकार संसद भी बधाई की पात्र बनी । जनभावना को सम्मान देते हुए सभी राजनीतिक दलों के सासंदो ने जनलोक पाल विषय पर चर्चा के साथ-साथ अण्णा से अनश्न समाप्त करने की गुहार लगाई। सरकार ने भी अपने रुख में नरमी दिखाते हुए अण्णा के तीन मांगो को संसद में सर्वसम्मति से स्विकार कर लिया। जनलोकपाल के तीनों मांगो पर चर्चा का आरंम्भ विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज ने अपने मंझे अंदाज मे शुरु की और सरकार के तरफ से संदीप दीक्षित ने जजों को छोड़कर लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के प्रति अपनी सहमति रखी । इसे देखकर तो ऐसा लगने लगा था की संसद जनलोकपाल और अण्णा के स्वास्थ्य को लेकर काफी संजीदा है लेकिन बहस जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया उसमें हल्कापन आता गया। इस पूरे बहस के दैरान यह देखने को मिला की सांसद कितने अनुशासित, धैर्यवान और समझदार हैं। इन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि उनकी ये हरकतें देशवासी भी देख रहें है। बार-बार सभापति द्वारा निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के संकेत दिए जाने के बावजूद सदस्य जिस तरह से उनके निर्देशों को अनसुना कर रहे थे, वह देश की सर्वोच्चय संस्था संसद की गरिमा के विपरीत था।

रामलीला मैदान के मंच से अभिनेता ओमपुरी ने सांसदो पर जिस तरह की टिप्पणी की उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। हलांकि इस पर बाद में वे माफी भी मांग लिए थे। लेकिन इस अभद्रता पर जो सांसद संसद में सबसे ज्यादा बोल रहे थे वे खुद देश के प्रथम व्यक्ति महामहिम राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सफेद हाथी तक कह डाला। क्या इसके लिए इन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए? यह सिलसिला यहीं तक नहीं थमा पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने जिस तरह से अण्णा के अनशन पर चुटकी लेते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई अससे इन लोगों की संसद और मुद्दों के प्रति निष्ठा और गहराई मापी जा सकती है।

बहराल राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर सांसदों की बहस कितनी कारगर रही वो तो आने वाले विधान सभा चुनाव में ही पता चल पाएगा। सरकार बड़ी चतुराई से अण्णा के तीनों मांगो पर हामी भर कर आंदोलन का पटापेक्ष तो कर दिया है लेकिन जनलोकपाल पर सरकार की क्या रुख होती है यह तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगा।

शनिवार, 13 अगस्त 2011

वर्तमान सत्ता के मायने

यूपीए- दो सरकार आर्थिक नवउदारवाद के एजेंडे को बेशर्मी के साथ आगे बढ़ा रही है, इस कारण जनता की तकलीफें-परेशानियां कई गुना बढ़ गई है। मुद्रास्फीति, नये साल के शुरुआत में 12-13% की दर से बढ़ रही है। वह सभी आवश्यक वस्तुओं, अनाज सब्जियों, खाद्यानों के मूल्यों में वृद्धि और पिछले जून में ईंधन के मूल्यों के डीरेगुलेशन के बाद से पेट्रोल के दाम में बार-बार की वृद्धि बढ़ती ही जा रही है। पेट्रोल के दाम में वृद्धि से हमेशा ही तमाम वस्तुओं के मूल्यों में सामान्यत: वृद्धि हो ही जाती है इसी कारण एक स्टेज पर प्याज 70-80 रुपये और फल, दूध, सब्जी सभी के दाम आसमान छुने लगे।

बेरोजगारी और रोजगार के अवसर में कमी हर गुजरते दिन के साथ बढ़ते जा रही है। वर्तमान सरकार खुद मानती है कि बेरोजगारी दर 9.4 प्रतिशत है यानी 2.8 प्रतिशत की अनुमानित दर से तीन गुना अधिक। अधिकांश संगठित उद्दोगों मे स्थायी कामों को ठेका मजदूरों और कैजुल मजदूरों से कराने का व्यापक पैमाने पर अपना लिया गया है। आर्थिक असमानता अर्थात् अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ रहा है एक तरफ विश्व के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में भारतियों की संख्या दो अंको में है तो गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अपनी उपलब्धियां दिखाने के लिए सरकार बीपीएल के मानदंडों में हेर-फेर कर रही है जबकि कड़वा सच यह है कि देश के लोग महंगाई, बेरोजगारी, वास्तविक मजदूरी में कमी और अन्य आर्थिक तकलीफों के बोझ तले कराह रहे हैं। योजना अयोग ने बीपीएल के नये मानदंड के लिए सुझाव दिया था जो व्यक्ति शहरी इलाकों मे 20 रुपये और ग्रामिण इलाकों में 15 रुपये रोजाना खर्च करने मे असमर्थ हैं वही बीपीएल में आने चाहियें। यह गरीबों को भुखमरी लाइन पर धकेलने के अलावा और कुछ नहीं है।

वर्तमान समय में जिस चीज नें आम लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा आकर्षित किया है वह है काला धन और भ्रष्टाचार। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने जनता का ध्यान इन मुद्दों पर फोकस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। ऐसे में घपलों और घोटालों जिनमें इतनी बड़ी घोटाला है कि देखकर दिमाग चकराने लगता है। मीडिया ने इन घोटालों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट, आदर्श सोसायटी घोटाला, इन्कम टैक्स प्राधिकरण द्वारा यह पुष्टि कि गांधी परिवार के सबसे करीबी क्वात्रओची और विन चड्ढा को बोफोर्स से कमीशन मिला था, इसरो(भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संगठन जो सिधे प्रधानमंत्री के तहत आता है) द्वारा देवास मल्टी मीडिया को वाणिज्यिक उपयोग के लिए एस-बैंड स्पेक्ट्रम का दिया जाना, घोटालों और घपलों की ये चंद उदाहरण है। इन घोटालों के पर्दाफाश के कारण पहले ही केन्द्र सरकार के तीन मंत्री (शशि थरुर और ए राजा, दयानिधि मारन), और एक मुख्यमंत्री अशोक चव्हान सरकार से बाहर हो चुके हैं दूसरी तरफ भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोप में कर्नाटक के मुख्यमंत्री और पंजाब में दो मंत्रियों को हटाना पड़ा।

जहां तक काले धन का संबंध है, यह भी एक पूंजीवादी समाज के लिए अपरिहार्य है इस पैसे को बिजनेस के लोग, शासक राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह हमेशा ही विदेशी बैंकों में जमा कराने के तरीके पर चलते आये हैं। हवाला कारोबार विश्व भर के तमाम टैक्स हेवन देशों से कालेधन को इधर से उधर ले जाने का काम करने के आधार पर ही फलता-फुलता है। एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के अनुसार 1948 से 2008 के बीच, 900,000 करोड़ रुपये से अधिक धन भारत से बाहर गया है और स्विस बैंकों एवं अन्य समुद्र पार टैक्स हेवन देशों में जमा किया गया है। जर्मनी के एक बैंक ने वहां कालेधन का खाता रखनेवाले भारत के लोगों की सूची सरकार को दी है, पर वर्तमान सरकार उनके नाम जाहिर करने से इंनकार कर रही है। इसके अलावा, देश के अंदर काले धन की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था है, और अनुमान है कि वह वास्तविक अर्थव्यवस्था से काफी बड़ी है।

मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और काले धन- ये तमाम बातें व्यवस्था की विफलता, सरकार की दिवालियापन को व्यक्त करती है। किसी भी सरकार की विदेश नीति उसकी आंतरिक नीतियों का, खासकर आर्थिक नीतियों का विस्तार होती है, अत: अमरीकी साम्राज्यवादियों की जोड़-तोड़ के सामने अधिकाअधिक आत्मसमर्पण किया जा रहा है। ब्रिक्स और जी-20 के मंच पर हमारी सकारात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद, आर्थिक मोर्चे पर हम पश्चिम देशों की जोड़तोड़ एवं तिकड़मबाजी के सामने पहले ही लगभग आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शंघाई सहयोग परिषद में शामिल होने का भारत का फैसला स्वागत योग्य है क्योंकि यह हमें साम्राज्यवादी दवाबों का काउंटर करने में मदद कर सकता है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी हम अमरीका की ओर मार्ग दर्शन के लिए देख रहे है। ईरान से संबंधित अनेक मामलों में हम अमरीका निर्दिष्ट लाइन पर दस्तखत करते रहे हैं। यहां तक की हम लीबिया पर बमबारी करने की इजाजत देने वाले अमरीका-ब्रिटेन प्रायोजित प्रस्ताव का विरोध करने में भी विफल रहे।

आर्थिक एवं विदेशी नीतियों में जारी दक्षीणपंथी एवं अमरीका परस्त शिफ्ट को गंभिरता से लेने की जरुरत है और हमारी आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए इस बढ़ते खतरे के विरुद्ध जनता को जागरुक किया जाना चाहिए।