मेरा बचपन गाँव में बीता है। मैं खेतों में घंटों घुटनों तक गीली मिट्टी में घूमने का मज़ा लेता था, किसानों के साथ उनकी मेहनत को करीब से देखता था और डीजल इंजन के धक्-धक् करते संगीत के बीच बहते पानी की धार में नहाने का आनंद उठाता था। गर्मियों में पके आमों के लालच में एक बगीचे से दूसरे बगीचे घूमना, छत पर बैठकर धूप सेंकते हुए खाना खाना, और कभी-कभी शरारती कौए द्वारा रोटी चुराए जाने की घटनाएँ—यह सब याद करके आज भी मन रोमांचित हो उठता है।
लेकिन इन यादों के साथ एक गहरी कसक भी जुड़ी हुई है। जब भी वर्षों बाद अपने गाँव लौटता हूँ, तो एक कमी साफ़ दिखाई देती है—वो नन्हीं चहचहाती चिड़ियाँ, जो कभी हमारे आंगन, खिड़कियों और पेड़ों पर फुदका करती थीं, अब कहीं नजर नहीं आतीं। गौरैया, तोता, मैना और कौवे जो बचपन की दुनिया का अहम हिस्सा हुआ करते थे, अब तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इनकी अनुपस्थिति न केवल मेरे बचपन की यादों को फीका कर रही है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी एक बड़ा खतरा बन रही है।
गौरैया का गायब होता संसार
कभी घरों और चौबारों में बसेरा करने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही दिखाई देती है। आधुनिक मकानों में आंगन और खुले स्थानों की कमी ने उसके प्राकृतिक आवास को छीन लिया है। शहरीकरण के कारण पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते गाँव-शहरों ने उसके लिए घोंसला बनाना कठिन कर दिया है। इसके अलावा, मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन भी गौरैया की घटती संख्या के पीछे एक बड़ा कारण माना जाता है।
गिद्धों की घटती संख्या: पर्यावरणीय संकट
गौरैया ही नहीं, बल्कि गिद्धों की संख्या में भी चिंताजनक गिरावट आई है। गिद्ध, जो प्राकृतिक सफाईकर्मी होते हैं और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, अब संकटग्रस्त प्रजातियों में गिने जाने लगे हैं। पहले ये बड़े पैमाने पर खेतों, जंगलों और गाँवों के आस-पास देखे जाते थे, लेकिन अब इनकी संख्या कुछ हजार तक सिमट गई है।
एक समय था जब देश में करोड़ों की संख्या में गिद्ध पाए जाते थे, लेकिन अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि सरकार को इनके संरक्षण के लिए विशेष केंद्र स्थापित करने पड़े हैं। पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल) और रानी (असम) में गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र चलाए जा रहे हैं, लेकिन यह प्रयास अभी भी नाकाफी साबित हो रहे हैं।
क्या कर सकते हैं हम?
यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या हम इन पक्षियों को बचाने के लिए कुछ कर सकते हैं? जवाब है—हाँ। हम निम्नलिखित प्रयास कर सकते हैं:
घरों में कृत्रिम घोंसले बनाना: गौरैया के लिए छोटे-छोटे लकड़ी के घोंसले अपने घरों, बालकनी या छतों पर लगाना एक अच्छा प्रयास हो सकता है।
पौधारोपण को बढ़ावा देना: अधिक से अधिक पेड़ लगाकर हम पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध करा सकते हैं।
खुले स्थानों में पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना: गर्मी के दिनों में छतों और बगीचों में पानी के बर्तन और अनाज रखना पक्षियों की संख्या बढ़ाने में मदद कर सकता है।
कीटनाशकों और जहरीले रसायनों का कम उपयोग: खेतों और बाग-बगीचों में रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से पक्षियों के भोजन के स्रोत नष्ट हो रहे हैं। जैविक खेती को अपनाना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
गिद्धों के संरक्षण कार्यक्रमों का समर्थन करना: गिद्धों को बचाने के लिए हमें सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी और इनके संरक्षण के लिए आवाज उठानी होगी।
निष्कर्ष
हमारे बचपन की यादों के साथ ये नन्हे परिंदे भी धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। यदि हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही गौरैया, गिद्ध और अन्य पक्षियों के बारे में जानने का मौका मिलेगा। हमें अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए प्रकृति के इस अनमोल खजाने को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।
क्योंकि जब ये परिंदे उड़ान भरते हैं, तो हमारी यादें भी उनके साथ पंख फैलाती हैं।
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