मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

चुनाव में पर्यावरण बन पाएगा विकास का मुद्दा ?

पाँच राज्यों में हो रहे चुनावों में अलग-अलग राजनैतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में अपने कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है। हमेशा की तरह वोटरों को सपने दिखाये जा रहे हैं। कोई विजन की बात कर रहा है तो कोई मन्दिर बनाने की, दिखाने को नारे, झण्डे और प्रतीक भले ही अलग-अलग हैं पर सब की कार्यशैली लगभग एक सी है। विकास के मुद्दे चुनाव प्रचार में छाए हुए हैं, शुद्ध पर्यावरण की बात कोई नहीं कर रहा है कहावत भी है 'जैसा खाए अन्न, वैसा होये मन' जैसा पीये पानी, वैसी बोले वाणी। ऐसे में आज प्रदूषित वातावरण में लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है पूरी दुनिया आज पर्यावरण के संकट से जूझ रही है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है हरित या साफ-सुथरी तकनीक का विकास और उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचलन। इस दिशा में भारत जैसे विकासशील देश भी अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते

दरअसल
, आज हमारी समूची राजनीति ही लोकविमुख और पथभ्रष्ट हो चुकी है। यही वजह है कि लोक से जुड़े पर्यावरण जैसे अहम मसलों को अकादमिक या बौद्धिक विमर्श का विषय मान लिया गया है
और न ही ऐसे मसलों को लेकर कोई राजनीतिक दल जनांदोलन छेड़ते हैं। विभिन्न राज्यों में हो रहे चुनाव को लेकर राजनितिक पार्टियाँ अपने घोषणा पत्र में वोटरों को लुभाने के लिए कई तरह के वादें कर रही है कोई २४ घंटे बिजली देने , तो कोई रोजगार के लिए कम्पनियों को लाने, आधुनिक शहर बनाने, पेरिस और लन्दन की तर्ज पर सड़के बनाने की बात कर रही है और इन सारी सुविधाओं के लिए जंगल से लेकर जंगली जानवर और पारम्परिक जल सोत्र सबको नष्ट करते जा रहें है.यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। शहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित वायु और ये दूषित हवा हमारे फेफड़ों में जाती है जिसके कारण दमा जैसी गंभीर सांस की बीमारी होती है कुछ ऐसे हीं श्वास के रोग और भी हैं जिनका इलाज़ संभव नहीं हैआज सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के जरूरी उपाय पर किसी राजनितिक पार्टी के पास कोई रणनीति नहीं है परिवहन व्यवस्था भ्रष्टाचार, अक्षमता, विलम्ब और अविश्वसनीयता की शिकार है। इसी कारण शहरों में बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं इन इलाकों में वाहनों से होने वाले प्रदुषण का स्तर भी हर समय काफी उंचा होता है

आज इतने सालों के बाद भी हमारे नेता साफ़ पानी तक उपलब्ध नहीं करा पाए देश में 75 प्रतिशत लोग अशुद्ध जल पीने को मजबूर है जो देश में व्याप्त अधिकतर महामारी की जड़ है छुआछूत की 20 प्रतिशत बिमारी दूषित पानी से हो रही है। 11 करोड़ घरों में एवं 30 प्रतिशत विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद 1 लाख से अधिक लोग आज भी मैला उठाने का कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसे दूर करने के लिए इन नेताओं के पास कोई रणनीति नहीं है और यह चुनाव का मुद्दा भी नहीं बनता ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है

ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है.
पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है। ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जाता रहे हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नहीं पता.ऐसे में हम खतरे को देखकर आँख बंद करने की गलती कर रहे हैं. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसके अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं
यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

विलुप्त होती यादें और पक्षी: बचपन से पर्यावरणीय चिंता तक

मेरा बचपन गाँव में बीता है। मैं खेतों में घंटों घुटनों तक गीली मिट्टी में घूमने का मज़ा लेता था, किसानों के साथ उनकी मेहनत को करीब से देखता था और डीजल इंजन के धक्-धक् करते संगीत के बीच बहते पानी की धार में नहाने का आनंद उठाता था। गर्मियों में पके आमों के लालच में एक बगीचे से दूसरे बगीचे घूमना, छत पर बैठकर धूप सेंकते हुए खाना खाना, और कभी-कभी शरारती कौए द्वारा रोटी चुराए जाने की घटनाएँ—यह सब याद करके आज भी मन रोमांचित हो उठता है।

लेकिन इन यादों के साथ एक गहरी कसक भी जुड़ी हुई है। जब भी वर्षों बाद अपने गाँव लौटता हूँ, तो एक कमी साफ़ दिखाई देती है—वो नन्हीं चहचहाती चिड़ियाँ, जो कभी हमारे आंगन, खिड़कियों और पेड़ों पर फुदका करती थीं, अब कहीं नजर नहीं आतीं। गौरैया, तोता, मैना और कौवे जो बचपन की दुनिया का अहम हिस्सा हुआ करते थे, अब तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इनकी अनुपस्थिति न केवल मेरे बचपन की यादों को फीका कर रही है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी एक बड़ा खतरा बन रही है।

गौरैया का गायब होता संसार

कभी घरों और चौबारों में बसेरा करने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही दिखाई देती है। आधुनिक मकानों में आंगन और खुले स्थानों की कमी ने उसके प्राकृतिक आवास को छीन लिया है। शहरीकरण के कारण पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के जंगलों में तब्दील होते गाँव-शहरों ने उसके लिए घोंसला बनाना कठिन कर दिया है। इसके अलावा, मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन भी गौरैया की घटती संख्या के पीछे एक बड़ा कारण माना जाता है।

गिद्धों की घटती संख्या: पर्यावरणीय संकट

गौरैया ही नहीं, बल्कि गिद्धों की संख्या में भी चिंताजनक गिरावट आई है। गिद्ध, जो प्राकृतिक सफाईकर्मी होते हैं और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, अब संकटग्रस्त प्रजातियों में गिने जाने लगे हैं। पहले ये बड़े पैमाने पर खेतों, जंगलों और गाँवों के आस-पास देखे जाते थे, लेकिन अब इनकी संख्या कुछ हजार तक सिमट गई है।

एक समय था जब देश में करोड़ों की संख्या में गिद्ध पाए जाते थे, लेकिन अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि सरकार को इनके संरक्षण के लिए विशेष केंद्र स्थापित करने पड़े हैं। पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल) और रानी (असम) में गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र चलाए जा रहे हैं, लेकिन यह प्रयास अभी भी नाकाफी साबित हो रहे हैं।

क्या कर सकते हैं हम?

यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या हम इन पक्षियों को बचाने के लिए कुछ कर सकते हैं? जवाब है—हाँ। हम निम्नलिखित प्रयास कर सकते हैं:

  1. घरों में कृत्रिम घोंसले बनाना: गौरैया के लिए छोटे-छोटे लकड़ी के घोंसले अपने घरों, बालकनी या छतों पर लगाना एक अच्छा प्रयास हो सकता है।

  2. पौधारोपण को बढ़ावा देना: अधिक से अधिक पेड़ लगाकर हम पक्षियों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध करा सकते हैं।

  3. खुले स्थानों में पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना: गर्मी के दिनों में छतों और बगीचों में पानी के बर्तन और अनाज रखना पक्षियों की संख्या बढ़ाने में मदद कर सकता है।

  4. कीटनाशकों और जहरीले रसायनों का कम उपयोग: खेतों और बाग-बगीचों में रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से पक्षियों के भोजन के स्रोत नष्ट हो रहे हैं। जैविक खेती को अपनाना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  5. गिद्धों के संरक्षण कार्यक्रमों का समर्थन करना: गिद्धों को बचाने के लिए हमें सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी और इनके संरक्षण के लिए आवाज उठानी होगी।

निष्कर्ष

हमारे बचपन की यादों के साथ ये नन्हे परिंदे भी धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। यदि हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही गौरैया, गिद्ध और अन्य पक्षियों के बारे में जानने का मौका मिलेगा। हमें अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए प्रकृति के इस अनमोल खजाने को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।

क्योंकि जब ये परिंदे उड़ान भरते हैं, तो हमारी यादें भी उनके साथ पंख फैलाती हैं।

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

घाना में कलरव करते सायबेरियन पक्षी

कहा जाता है की प्रकृति माँ सबसे सुन्दर होती है और मै वही सुन्दरता को अपनी आँखों से देखने की चाहत में भरतपुर उद्यान जा पहुंचे प्रकृति के नज़ारे को करीब से देखने के लिए हम सब हमेशा लालायित रहते है, लेकिन इस नज़ारे को देखने के लिए समय निकालना आसान नहीं होता। कभी प्रकृति को देखने का मौसम नहीं है, तो कभी समय का अभाव। अगर आप भी बाघों और अपनी दुनिया में मस्ती करते अन्य जंगली जीव-जंतुओं को देखना चाहते हैं तो भरतपुर पक्षी अभयारण्य आपके लिए अच्छी जगह हो सकता है। केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान में प्रकृति और मानव इतिहास का नाता करीब 250 वर्ष पुराना है। सन् 1745 में गंभीर और बाणगंगा नदी के मिलन स्थान पर बनी छिछली जगह में भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने बारिश के मौसम में बरसने वाले पानी पर अजान बांध बनवाया और प्राक्रतिक गहराई में पानी भरने से यह स्थान विकसित हुआ। यहां पर बाढ़ के कारण छिछला आर्द्र पारिस्थितिकीय तंत्र बना, जो विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों के लिए एक बेहतर निवास स्थान बन गया। नमभूमि वाला यह क्षेत्र रामसर स्थली भी है और इसे प्राकृतिक विश्व धरोहर भी घोषित किया गया है। भरतपुर शहर से दो किलोमीटर दूरी पर घाना पक्षी अभयारण्य पहले भरतपुर राजपरिवार की शिकारगाह हुआ करता था। इस स्थान को सन् 1956 में पक्षी अभयारण्य और सन् 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया, जबकि 1985 में इसे विश्व विरासत का दर्जा मिला। यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान पक्षी संसार का स्वर्ग है तो पक्षी प्रेमियों का तीर्थ। पक्षियों की दुनियाँ भी वड़ी विचित्र होती है।
यह प्रकृति पदत्त सबसे सुन्दर जीवों की श्रेणी में आते हैं। इनसे मानव के साथ रिश्तों की जानकारी के उल्लेख प्राचीनतम ग्रंथों में भी मिलते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान में सुंदर पक्षियों के 375 से अधिक प्रजातियों का बसेरा है। इनमें से 132 से अधिक यहीं पर अपने परिवार को बढ़ाते हैं। यहां केवल देश से, बल्कि यूरोप, साइबेरिया, चीन और तिब्बत से भी पक्षी आते हैं। मानसून में यहां साइबेरियाई बार हेडेडगूंज, कोमन क्रेन, चीन का चायनाकूट, साइबेरियाई पिंकटेल, मंगोलियाई सोबलर, पेलिकन, श्रीलंकाई ब्लेकनेक स्टॉर्क सहित सांभर को भी देखा जा सकता है। पक्षियों की प्रवास यात्राएं सबसे लंबी, चुनौती भरी और विलक्षण होती है। इन पक्षियों के प्रवास-यात्राओं पर जाने के अनेक कारण हैं, जिनमें से मुख्य हैं मौसम में असहनीय परिवर्तन और भोजन की कमी। प्रकृति की अनुपम देन पंखों की सहायता से वे संसार के एक क्षोर से दुसरे क्षोर तक यात्रा सुगमता पूर्वक कर लेते हैं। इनकी सबसे प्रसिद्ध यात्रा उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिण की तरफ की है। गृष्म काल में तो उत्तरी गोलार्द्ध का तापमान ठीक-ठीक रहता है, पर जाड़ों में ये पूरा क्षेत्र बर्फ से ढ़ंक जाता है। तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। इस क्षेत्र में पक्षियों के लिए खाने-पीने और रहने की सुविधाओं का अभाव हो जाता है। ऐसी परिस्थित में उनका जीना मुश्किल हो जाता है। फलतः वे आश्रय की तलाश में गर्म हिस्सों में प्रवास कर जाते हैं। गर्मियों में जब बर्फ़ पिघलती है और वनस्पतियां उगने लगती हैं तो भरपूर भोजन और खुले माहौल का आनंद उठाने ये फिर वापस लौट जाते हैं। पिछले सालो की तुलना में इस साल विदेशी मेहमानों की संख्या में थोड़ी कमी आई है जिसके कारण यहाँ घुमने आने वाले सैलानियों की तादाद कम हो गयी है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है। मौसम मे परिवर्तन प्रवासी पक्षियों को रास नहीं आता इस कारण वे अब मुंह मोड़ने लगे हैं जलवायु परिवर्तन से पक्षियों का प्रवास बहुत प्रभावित हुआ है। पहले पूर्वी साइबेरिया क्षेत्र के दुर्लभ पक्षी मुख्यतः साइबेरियन सारस भारत में आते थे।
जलस्रोतों के सूखने से उनके प्रवास की क्रिया समाप्त हो गई है।
ये सुदूर प्रदेशों से अपना जीवन बचाने और फलने फूलने के लिए आते रहे हैं। पर हाल के वर्षों में इनके जाल में फांस कर शिकार की संख्या बढ़ी है। कई बार तो शिकारी तालाब या झील में ज़हर डाल कर इनकी हत्या करते हैं। माना जाता है कि उनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है तथा उच्च वर्ग में इसका काफ़ी मांग होती है। अब वे चीन की तरफ जा रहे हैं। हम एक अमूल्य धरोहर खो रहे हैं। पक्षियों के प्रति लोगों में पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना चाहिए। पक्षी विहार से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा काफी बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को दखने पर्यटक आते हैं। घना में करीब 29 वर्ग किलोमीटर में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान पूरे साल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। विदेशी पर्यटकों के लिए 200 रुपए और भारतीयों के लिए 25 रुपए प्रति व्यक्ति का टिकट है। यहां उद्यान में वाहन से शांति कुटीर तक जाने की व्यवस्था है, जो गेट से 17 किलोमीटर है। इसके लिए 50 रुपए प्रति वाहन शुल्क अलग से लगता है।
यहाँ कैसे पहुंचे :-
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान दिल्ली से १७६ किमी और जयपुर से १७६ किमी की दूरी पर है. भरतपुर आगरा , दिल्ली और जयपुर से सड़क और रेल मार्ग से भी जुड़ा हुआ है. भरतपुर रेलवे स्टेशन से पार्क की दूरी ६ किमी है
घुमने के लिए बेहतर समय:
यह राष्ट्रीयन उद्यान पुरे साल घुमने वालो के लिए खुला रहता है लेकिन प्रवासी पक्षियों के देखने के लिहाज से नवम्बर से लेकर मार्च तक का महिना उपुक्त रहता है

औली यानि भारत में स्विट्ज़रलैंड का मजा

हिमालय पर्वत की बर्फ से लदी ऊँची पर्वत चोटियाँ सदैव से ही यहाँ आने वाले पर्यटकों को आकर्षित एवं उत्साहित करती रही हैं। उत्तराखंड राज्य की भूमि से प्रमुख रूप से भारत वर्ष की दो अति पावन और पवित्र नदियाँ, गंगा और यमुना का उदगम हुआ है। इसी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता को निहारने की चाहत में हम उत्तराखंड जा पहुँचे। शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी से दूर औली एक बहुत ही बेहतरीन पर्यटक स्थल है। ऊँचे-ऊँचे आसमान छूते सफेद चमकीले पहाड़, मीलों दूर तक फैली सफेद बर्फ की चादर, दूर-दूर तक दिखते बर्फीली चोटियों के दिलकश नज़ारे! नहीं भई... इसके लिए स्विट्ज़रलैंड जाने की जरूरत नहीं, ऐसी जगह तो हमारे पास भी मौजूद है। हम बात कर रहे हैं औली की, जो कि उत्तराखंड में है।

औली इन दिनों पर्यटकों के लिए सबसे पसंदीदा जगह बन गया है। प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत यह जगह भारत का सबसे लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेस है। उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के पास समुद्र तल से 9,000 फिट की ऊँचाई पर यह स्थित है। जोशीमठ से औली जाने के लिए दो रास्ते हैं: एक तो सड़क का और दूसरा रोपवे का। करीब चार किलोमीटर लंबे रोपवे से जाने पर इस जन्नत का नज़ारा और भी खूबसूरत हो जाता है। जोशीमठ से कुछ ही दूरी पर चिनाब झील है, इस स्थान तक पहुंचने के लिए घने जंगल और मखमली घास के मैदान से होते हुए जाना पड़ता है।

औली की तरफ पर्यटकों के रुख की सबसे बड़ी वजह स्कीइंग के लिए पहाड़ों के बेहतरीन ढलान हैं। ये ढलान दिसंबर के मध्य से अप्रैल तक सफेद कालीन जैसी बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहती हैं। ढलानों पर जमीं बर्फ और ओक के जंगल स्कीइंग के दीवानों के दिल जीत लेते हैं। जिन लोगों ने कभी स्कीइंग करने या सीखने के अरमान संजोए रखे हों, उनके लिए यह बहुत अच्छी जगह है। यहाँ गढ़वाल मंडल विकास निगम ने स्की सिखाने की व्यवस्था की है। मंडल द्वारा 7 दिन के लिए नॉन-सर्टिफिकेट और 14 दिन के लिए सर्टिफिकेट ट्रेनिंग दी जाती है। यह ट्रेनिंग हर वर्ष जनवरी-मार्च में दी जाती है। नंदा देवी के पीछे सूर्योदय देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव है। यह औली से 40 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा, बर्फ गिरना और रात में खुले आकाश को देखना मन को प्रसन्न कर देता है।

पहुंचने के साधन: चूंकि औली को अभी तक रेल–मार्ग और वायु–मार्ग द्वारा सीधे नहीं जोड़ा गया है, अतः इन दोनों साधनों द्वारा यहां तक नहीं पहुंचा जा सकता। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। वहां से सड़क–मार्ग द्वारा (बस या टैक्सी से) औली पहुंचा जा सकता है। जबकि सबसे निकटतम एयरपोर्ट देहरादून में है, जो औली से 279 किमी दूर है। टैक्सी और कैब देहरादून एयरपोर्ट से हमेशा उपलब्ध रहती हैं। वैसे, देश के हर प्रमुख शहर से ऋषिकेश सड़क–मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ है। अतः बस, टैक्सी, या कार द्वारा देश के किसी भी भाग से औली पहुंचा जा सकता है।

बेहतर समय: हालाँकि गर्मी के दिनों में औली में काफी मजा आता है, बरसात के मौसम में अनगिनत प्रकार के फूल–पौधे देखने को मिलते हैं, लेकिन इस स्थान की विशेषता और महत्ता को देखते हुए यहां दिसंबर के मध्य से अप्रैल तक की अवधि में आने पर यात्रा अधिक सार्थक होती है।

यहाँ ठहरने के लिए कहाँ रुके: औली में रुकने के लिए क्लिफ टॉप रिसॉर्ट सबसे अच्छा स्थान है, जहाँ से आप नंदा देवी, त्रिशूल, कमेत, माना पर्वत, दूनागिरी, बैठातोली और नीलकंठ के बहुत ही सुंदर दृश्य का आनंद ले सकते हैं। इसके अलावा, गढ़वाल मंडल विकास निगम द्वारा डीलक्स झोपड़ियों के साथ बंगले की व्यवस्था की गई है, जहाँ एक दिन के करीब 700 रुपये का शुल्क लगता है।

यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित।

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मेलों का मेला पुष्कर मेला

राजस्थान में कई पर्यटन स्थल हैं जिनमें से पुष्कर एक है। पुष्कर झील अजमेर नगर से ग्यारह किमी उत्तर में स्थित है। पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को तीर्थराज कहा जाता है, उसी प्रकार से इस तीर्थ को पुष्करराज कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। यहां का मुख्य मन्दिर ब्रह्माजी का है, जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। मन्दिर में चतुर्मुख ब्रह्माजी की दाहिनी ओर सावित्री और बायीं ओर गायत्री का मन्दिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियां हैं, तो एक छोटे से मन्दिर में नारद जी की मूर्ति। एक मन्दिर में हाथी पर बैठे कुबेर तथा नारद की मूर्तियां हैं। पुष्कर में दुनिया के सबसे बड़े ऊंट मेले के रूप में जाना जाता है। यह अंतरराष्ट्रीय मेला सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। हर साल संपन्न होने वाला यह मेला कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से पूर्णिमा तक चलता है, जिसमें देश विदेश से भारी संख्या में सैलानी पहुंचते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार राज्य में आने वाले प्रति दस पर्यटकों में से 8 पुष्कर आए बगैर नहीं जाते। पर्यटकों की सर्वाधिक आवाजाही पुष्कर मेले में होती है। रेतीले धोरों में पशुपालकों की दिनचर्या, राजस्थान की पारंपरिक लोक संस्कृति, धार्मिक क्रिया-कलाप देखने और उनसे जुड़ने में पर्यटकों की विशेष रुचि होती है। मेले के बाद पुष्कर में पर्यटकों की संख्या में कमी आ जाती है। साल भर सामान्य तरीके से ही पर्यटक पहुंचते हैं। मेलों के रंग राजस्थान में देखते ही बनते हैं। ये मेले मरुस्थल के गांवों के कठोर जीवन में एक नवीन उत्साह भर देते हैं। लोग रंग–बिरंगे परिधानों में सज–धजकर जगह–जगह पर नृत्य गादि में भाग लेते हैं।
पुष्कर मेला थार मरुस्थल का एक लोकप्रिय व रंगों से भरा मेला है। .वैसे तो इस मेले का खास आकर्षण भारी संख्या में पशु ही होता है। फिर भी पुष्कर में भ्रमण के लिए यहां स्थित 400 मंदिर हैं तथा जगह -जगह स्थित 52 घाट पुष्कर के खास आकर्षण हैं। बदलते दौर के चलते यहां देश विदेश से आये पर्यटकों के बीच क्रिकेट मैच, यहां के पारंपरिक नृत्य, गीत संगीत, रंगोली, यहां का काठ पुतली नृत्य आदि भी इस मेले के विशेष आकर्षणों में शामिल हैं। इस मेले में ऊंट अथवा अन्य घरेलू जानवरों की क्रय-बिक्री के लिए लाए जाते हैं। इसे ऊंटों का मेला भी कहा जाता है। इस मेले में पशु पालकों को अच्छी नस्ल के पशु आसानी से मिल जाते हैं। मेले के समय पुष्कर में कई संस्कृतियों का मिलन देखने को मिलता है। एक तरफ तो मेला देखने के लिए विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, तो दूसरी तरफ राजस्थान व आसपास के तमाम इलाकों से आदिवासी और ग्रामीण लोग अपने-अपने पशुओं के साथ मेले में शरीक होने आते हैं। मेला रेत के विशाल मैदान में लगाया जाता है। ढेर सारी कतार की कतार दुकानें, खाने-पीने के स्टाल, सर्कस, झूले और न जाने क्या-क्या। ऊंट मेला रेगिस्तान से नजदीकी को बताता है। इसलिए ऊंट तो हर तरफ देखने को मिलते ही हैं।
देशी -विदेशी सैलानियों को यह मेला इसलिए लुभाता है, क्योंकि यहां उम्दा जानवरों का प्रदर्शन तो होता ही है, राजस्थान की कला-संस्कृति की अनूठी झलक भी मिलती है। लोक संगीत और लोक धुनों की मिठास भी पर्यटकों को काफी लुभाती है। वैसे यहां सैलानियों के लिए मटका फोड़, लंबी मूंछ, दुलहन प्रतियोगिता जैसे कई कार्यक्रम भी मेला आयोजकों की तरफ से किए जाते हैं जो आकर्षण के केंद्र होते हैं। पुष्कर में कई संस्कृतियों का मिलन देखने को मिलता है। एक तरफ तो विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, तो दूसरी तरफ राजस्थान व आसपास के तमाम इलाकों से आदिवासी और ग्रामीण लोग अपने-अपने पशुओं के साथ मेले में शरीक होने आते हैं

यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

क्रिसमस त्योहार के मायने


मौसम की सर्द हवाएँ क्रिसमस को दस्तक देते हुए नववर्ष का आगमन का संदेश 'हैलो' से देती हैं और लाल हरी छटा, प्रकृति में हर तरफ़ नज़र आने लगती है। सदाबहार झाड़ियाँ तथा सितारों से लदें क्रिसमस वृक्ष को सदियों से याद किया जाता रहा है। हांलाकि ट्री नाम से जाना जाने वाला यह वृक्ष ईसा युग से भी पूर्व पवित्र माना जाता था। इसका मूल आधार यह रहा है, कि 'फर ' वृक्ष की तरह सदाबहार वृक्ष बर्फ़ीली सर्दियों में भी हरे भरे रहते हैं। इसी धारणा से रोमनवासी सूर्य भगवान के सम्मान में मनाए जाने वाले सैटर्नेलिया पर्व में चीड़ के वृक्षों को सजाते थे।

यूरोप के अन्य भागों में हँसी खुशी के विभिन्न अवसरों पर भी वृक्षों की सजाने की प्राचीन परम्परा थी। इंग्लैंड़ और फ्रांस के लोग ओक के वृक्षों को फसलों के देवता के सम्मान में फूलों तथा मोमबतियों से सजाते थे। इस दिन लोग अपने घरों को रंग-बिरंगे फूलों, सदाबहार पेड़-पौधों तथा सुंदर काग़ज़ के कंदीलों से सजाते हैं। क्रिसमस के दिन उपहारों का लेन देन, प्रार्थना गीत, अवकाश की पार्टी तथा चर्च के जुलूस- सभी हमें बहुत पीछे ले जाते हैं। यह त्योहार सौहार्द, आह्लाद तथा स्नेह का संदेश देता है। विशेष रूप से यह आगमन के काल से जुड़ा हुआ है। यह पुरे मौज मस्ती के साथ मनाया जाता है दुनिया भर के अधिकतर देशों में यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर को ही यूरोप तथा कुछ अन्य देशों में इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं। यहाँ क्रिसमस अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। फ्रांस में यह मान्यता प्रचलित है कि पेयर फुटार्ड उन सभी बच्चों का ध्यान रखते हैं, जो अच्छे काम करते हैं और 'पेयर नोएल' के साथ मिलकर वे उन बच्चों को उपहार देते हैं। इटली में सांता को 'ला बेफाना' के नाम से जाना जाता है, जो बच्चों को सुंदर उपहार देते हैं। यहाँ ६ जनवरी को भी लोग एक-दूसरे को उपहार देते हैं, क्योंकि उनकी मान्यता के अनुसार इसी दिन 'तीन बुद्धिमान पुरुष' बालक जीजस के पास पहुँचे थे। इसके साथ ही आइसलैंड में यह दिन बेहद अनोखे ढंग से मनाया जाता है। वहाँ एक के बजाय १३ सांता क्लाज होते हैं और उन्हें एक पौराणिक राक्षस 'ग्रिला' का वंशज माना जाता है। उनका आगमन १२ दिसंबर से शुरू होता है और यह क्रिसमस वाले दिन तक जारी रहता है। ये सभी सांता विनोदी स्वभाव के होते हैं। इसके विपरीत डेनमार्क में 'जुलेमांडेन' (सांता) बर्फ़ पर चलनेवाली गाड़ी- स्ले पर सवार होकर आता है। यह गाड़ी उपहारों से लदी होती है और इसे रेंडियर खींच रहे होते हैं। नॉर्वे के गाँवों में कई सप्ताह पहले ही क्रिसमस की तैयारी शुरू हो जाती है। वे इस अवसर पर एक विशेष प्रकार की शराब तथा लॉग केक (लकड़ी के लठ्ठे के आकार का केक) घर पर ही बनाते हैं। त्यौहार से दो दिन पहले माता-पिता अपने बच्चों से छिपकर जंगल से देवदार का पेड़ काटकर लाते हैं और उसे विशेष रूप से सजाते हैं। इस पेड़ के नीचे बच्चों के लिए उपहार भी रखे जाते हैं। क्रिसमस के दिन जब बच्चे सोकर उठते हैं तो क्रिसमस ट्री तथा अपने उपहार देखकर उन्हें एक सुखद आश्चर्य होता है। डेनमार्क के बच्चे परियों को 'जूल निसे' के नाम से जानते हैं और उनका विश्वास है कि ये परियाँ उनके घर के टांड पर रहती हैं।फिनलैंड के निवासियों के अनुसार सांता उत्तरी ध्रुव में 'कोरवातुनतुरी' नामक स्थान पर रहता है। दुनिया भर के बच्चे उसे इसी पते पर पत्र लिख कर उसके समक्ष अपनी अजीबोग़रीब माँगे पेश करते हैं। उसके निवास स्थान के पास ही पर्यटकों के लिए क्रिसमस लैंड नामक एक भव्य थीम पार्क बन गया है। यहाँ के निवासी क्रिसमस के एक दिन पहले सुबह को चावल की खीर खाते हैं तथा आलू बुखारे का रस पीते हैं। इसके बाद वे अपने घरों में क्रिसमस ट्री सजाते हैं। दोपहर को वहाँ रेडियो पर क्रिसमस के विशेष शांति-पाठ का प्रसारण होता है।
इंग्लैंड में इस त्यौहार की तैयारियाँ नवंबर के अंत में ही शुरू हो जाती हैं। बच्चे बड़ी बेताबी से क्रिसमस का इंतज़ार करते हैं और क्रिसमस का पेड़ सजाने में अपने माता-पिता की सहायता करते हैं। २४ दिसंबर की रात को वे पलंग के नीचे अपना मोजा अथवा तकिये का गिलाफ़ रख देते हैं, ताकि 'फादर क्रिसमस' आधी रात को आकर उन्हें विभिन्न उपहारों से भर दें। जब वे अगले दिन सोकर उठते हैं तो उन्हें अपने पैर के अंगूठे के पास एक सेब तथा ऐड़ी के पास एक संतरा रखा हुआ मिलता है। इस अवसर पर बच्चे पटाखे भी जलाते हैं। यहाँ क्रिसमस के अगले दिन 'बॉक्सिंग डे' भी मनाया जाता है, जो सेंट स्टीफेन को समर्पित होता है। कहते हैं कि सेंट, स्टीफेन घोड़ों को स्वस्थ रखते हैं। यहाँ बाक्सिंग का मतलब घूसेबाजी से नहीं है, बल्कि उन 'बाक्स' (डिब्बों) से है, जो गिरजाघरों में क्रिसमस के दौरान दान एकत्र करने के लिए रखे जाते थे। २६ दिसंबर को इन दानपेटियों में एकत्र धन गरीबों में बाँट दिया जाता था। रूस में इन दिनों भयंकर बर्फ़ पड़ी रही होती है, फिर भी लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं आती। वे २३ दिसंबर से ५ जनवरी तक इस त्यौहार को मनाते हैं। उत्सवों के नगर सिंगापुर में भी इस त्यौहार का विशेष महत्व है। यहाँ महीनों पहले से ही इसकी तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं और सभी बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल में सजावट तथा रोशनी के मामले में परस्पर होड़ लग जाती है। अगर इन दिनों आप कभी सिंगापुर आएँ तो चांगी हवाई अडडे पर उतरते ही वहाँ सजे क्रिसमस ट्री देखकर आपको यह अहसास हो जाएगा कि यहाँ क्रिसमस की बहार शुरू हो गई है। हर साल यहाँ क्रिसमस के लिए कोई नई थीम ली जाती है, मसलन पिछले साल की थीम थी 'बर्फ़ीली क्रिसमस' जिसकी जगह से पूरे सिंगापुर में इस दौरान चारों तरफ़ सजावट तथा रोशनी में बर्फ़ का ही अहसास होता था। सिंगापुर की ही तरह मकाऊ तथा हांगकांग में भी क्रिसमस की अनोखी सजावट देखी जा सकती है ,इस पर हर साल लाखों डालर खर्च किए जाते हैं। अमरीका में सांता क्लाज के दो घर हैं - एक कनेक्टीकट स्थित टोरिंगटन में तथा दूसरा न्यूयार्क स्थित विलमिंगटन में। टोरिंगटन में सांता क्लाज अपने 'क्रिसमस गाँव' में आनेवाले बच्चों को अपनी परियों के साथ मिलकर उपहार देता है। इस अवसर पर इस गाँव को स्वर्ग के किसी कक्ष की तरह सजाया जाता है। व्हाइटफेस पर्वत के निकट विलिंगटन में सांता का स्थायी घर है। इस गाँव में एक गिरजाघर तथा एक डाकघर है। यहाँ एक लुहार भी रहता है। हर साल एक लाख से अधिक लोग इस गाँव के दर्शन करने आते हैं।
यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

कहावतो में सिमटा मौसम विज्ञान

आज हम आधुनिक यंत्रों के ज़रिए भविष्य के मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं.लेकिन सदियों पहले ही मारवाड़ के लोगों ने मौसम विज्ञान का सार तुकबंदियों और कहावतों में पिरो दिया था.बड़े बुर्जुगों से कई कहावतें आपने भी सुनी होगी, इन्हे परखने पर पता चलता है कि यह संक्षेप में सार बयां करने का बरसों पुराना अंदाज था.लेकिन क्या आप जानते है कि मौसम कि भविष्यवाणी करने वाली भी लोक कहावतें हैं.

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन कहावतों पर भरोसा करते है.यहाँ के लोगों ने अपना विज्ञान लोक कहावतों और तुकबंदियो के बलबूते विकसित किया है.आज भले ही आधुनिक मशीनी यंत्रो से मौसम वर्षा, आंधी, तूफान की अग्रिम जानकारी मिल जाती है लेकिन मारवाड़ के ग्रामीण जन आज भी इन कहावतों पर विश्वास करते हैं.यह कहावतें और भविष्य और इनके आधार पर की गई भविष्यवाणियां ज्यादातर सटीक और सही भी होती है.तभी तो इन लोगों का विश्वास इतना पक्का हो गया है.

कुछ कहावतें हैं जो दिन के हिसाब से मौसम का हाल बंया करती है.जैसे

शुक्रवार री बदरी,रही शनिचर छाए।
डंक कहे है भडड्ली,वर्षा बिन न जाए ।
स कहावत के अनुसार डंक भडड्ली से कहता है- य़दि शुक्रवार को बादल आए और शनिवार तक रहें, तो समझ जाओ कि बादल बरसे बिना नहीं जाएंगे, यानी ऐसे संकेत मिलने पर बारिश का होना तय समझा जाता है.........
माह मंगल, जेठ रबी,भारदेव सन होय।
डंक कहे है भडड्ली,बिरला जिवै कोय।
इसमें बताया गया है कि माघ माह में यदि पांच मंगलवार हों, जेठ माह मे पांच रविवार औऱ भादों में पांच शनिवार हो, तो डंक भडड्ली से कहता हैभविष्य में ऐसा अकाल पड़ेगा, जिसके बाद शायद ही कोई जीवित बचे.इनके अलावा कुछ ऐसी कहावतें हैं जो हवा के रुख़ को भांपकर बारिश या अकाल पड़ने की सम्भावना की बात कहती है...
नाडा टाकंण बलद विकावण।
मत बाजे तू, आधे सावण।
जब आधे सावन में दक्षिण पूर्व की हवा चलती है, तो मारवाड़ का किसान कहता है, हे भगवान ऐसी हवा मत चल, जिससे अकाल आने की सूचना मिलती है। जिसके कारण किसान को अपना बैल बेचना पड़ जाता है....
पवन बाजे सूरयो,तो हाली,
हलाव कीम पुरयो ।
यदि उतर-पश्चिम कोण की ओर से हवा चले, तो किसान को नई ज़मीन पर हल नहीं चलना चाहिए, क्योंकि मेघ जल्दी आने वाला है.....इसी तरह मारवाड़ के किसान सूर्य और चंद्रमा के उदय होने के स्थान पर भी निर्भर रहता है.....
सोमां, सुकरां, सुरगुंरा जै चंदो उगंत।
डंक काहे है भडड्ली,जल,थल एक करंत।
यदि आषाढ मास में चंद्रमा सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार को उदय हो, तो डंक भड्डली से कहता है कि जल थल एक हो जाएंगे यानी वर्षा खूब होगी......
इन कहावतों के आधार पर मौसम का अंदाजा लगाने का क्रम बरसों से चल रहा है और शायद आगे भी सदियों तक चलता रहेगा...मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यंत्रो के आने से बहुत पहले ही इस गांव के बुजुर्गों ने कहावतों में मौसम का भविष्य गढ़ दिया है। जिनकी सटीकता और प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता
सच, अद्भुत है हमारा देश।

बुधवार, 21 सितंबर 2011

धारा का सफर


जी करता है, आज एक धारा बन जाऊं,
दरिया की बाहों में बहते हुए,
सागर की गहराइयों में कहीं खो जाऊं।

न किनारों का बंधन हो, न कोई ठहराव,
बस लहरों संग नित नए सफर पर चलूं,
जहां मौन भी मुझे न छू सके,
ऐसे अनंत में कहीं विलीन हो जाऊं।

शब्दों की हलचल से दूर,
एक निर्जन सन्नाटे का हिस्सा बनूं,
जहां मेरी गूँज भी ख़ुद से अजनबी हो,
जहां समय भी मुझे पहचान न सके।

मैं बहूं, मैं बहूं, निरंतर बहूं,
ना किसी ओर ठहरूं, ना किसी में समाऊं,
सिर्फ़ एक अहसास बनकर रह जाऊं,
जिसे कोई देख न सके, बस महसूस कर पाए।

बुधवार, 7 सितंबर 2011

जनभावना की जीत

सामाजीक कार्यकर्त्ता अन्ना हजारे के द्वरा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में आखिरकार संसद भी बधाई की पात्र बनी । जनभावना को सम्मान देते हुए सभी राजनीतिक दलों के सासंदो ने जनलोक पाल विषय पर चर्चा के साथ-साथ अण्णा से अनश्न समाप्त करने की गुहार लगाई। सरकार ने भी अपने रुख में नरमी दिखाते हुए अण्णा के तीन मांगो को संसद में सर्वसम्मति से स्विकार कर लिया। जनलोकपाल के तीनों मांगो पर चर्चा का आरंम्भ विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज ने अपने मंझे अंदाज मे शुरु की और सरकार के तरफ से संदीप दीक्षित ने जजों को छोड़कर लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के प्रति अपनी सहमति रखी । इसे देखकर तो ऐसा लगने लगा था की संसद जनलोकपाल और अण्णा के स्वास्थ्य को लेकर काफी संजीदा है लेकिन बहस जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया उसमें हल्कापन आता गया। इस पूरे बहस के दैरान यह देखने को मिला की सांसद कितने अनुशासित, धैर्यवान और समझदार हैं। इन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि उनकी ये हरकतें देशवासी भी देख रहें है। बार-बार सभापति द्वारा निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के संकेत दिए जाने के बावजूद सदस्य जिस तरह से उनके निर्देशों को अनसुना कर रहे थे, वह देश की सर्वोच्चय संस्था संसद की गरिमा के विपरीत था।

रामलीला मैदान के मंच से अभिनेता ओमपुरी ने सांसदो पर जिस तरह की टिप्पणी की उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। हलांकि इस पर बाद में वे माफी भी मांग लिए थे। लेकिन इस अभद्रता पर जो सांसद संसद में सबसे ज्यादा बोल रहे थे वे खुद देश के प्रथम व्यक्ति महामहिम राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सफेद हाथी तक कह डाला। क्या इसके लिए इन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए? यह सिलसिला यहीं तक नहीं थमा पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने जिस तरह से अण्णा के अनशन पर चुटकी लेते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई अससे इन लोगों की संसद और मुद्दों के प्रति निष्ठा और गहराई मापी जा सकती है।

बहराल राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर सांसदों की बहस कितनी कारगर रही वो तो आने वाले विधान सभा चुनाव में ही पता चल पाएगा। सरकार बड़ी चतुराई से अण्णा के तीनों मांगो पर हामी भर कर आंदोलन का पटापेक्ष तो कर दिया है लेकिन जनलोकपाल पर सरकार की क्या रुख होती है यह तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगा।

शनिवार, 13 अगस्त 2011

वर्तमान सत्ता के मायने

यूपीए- दो सरकार आर्थिक नवउदारवाद के एजेंडे को बेशर्मी के साथ आगे बढ़ा रही है, इस कारण जनता की तकलीफें-परेशानियां कई गुना बढ़ गई है। मुद्रास्फीति, नये साल के शुरुआत में 12-13% की दर से बढ़ रही है। वह सभी आवश्यक वस्तुओं, अनाज सब्जियों, खाद्यानों के मूल्यों में वृद्धि और पिछले जून में ईंधन के मूल्यों के डीरेगुलेशन के बाद से पेट्रोल के दाम में बार-बार की वृद्धि बढ़ती ही जा रही है। पेट्रोल के दाम में वृद्धि से हमेशा ही तमाम वस्तुओं के मूल्यों में सामान्यत: वृद्धि हो ही जाती है इसी कारण एक स्टेज पर प्याज 70-80 रुपये और फल, दूध, सब्जी सभी के दाम आसमान छुने लगे।

बेरोजगारी और रोजगार के अवसर में कमी हर गुजरते दिन के साथ बढ़ते जा रही है। वर्तमान सरकार खुद मानती है कि बेरोजगारी दर 9.4 प्रतिशत है यानी 2.8 प्रतिशत की अनुमानित दर से तीन गुना अधिक। अधिकांश संगठित उद्दोगों मे स्थायी कामों को ठेका मजदूरों और कैजुल मजदूरों से कराने का व्यापक पैमाने पर अपना लिया गया है। आर्थिक असमानता अर्थात् अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ रहा है एक तरफ विश्व के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में भारतियों की संख्या दो अंको में है तो गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अपनी उपलब्धियां दिखाने के लिए सरकार बीपीएल के मानदंडों में हेर-फेर कर रही है जबकि कड़वा सच यह है कि देश के लोग महंगाई, बेरोजगारी, वास्तविक मजदूरी में कमी और अन्य आर्थिक तकलीफों के बोझ तले कराह रहे हैं। योजना अयोग ने बीपीएल के नये मानदंड के लिए सुझाव दिया था जो व्यक्ति शहरी इलाकों मे 20 रुपये और ग्रामिण इलाकों में 15 रुपये रोजाना खर्च करने मे असमर्थ हैं वही बीपीएल में आने चाहियें। यह गरीबों को भुखमरी लाइन पर धकेलने के अलावा और कुछ नहीं है।

वर्तमान समय में जिस चीज नें आम लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा आकर्षित किया है वह है काला धन और भ्रष्टाचार। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने जनता का ध्यान इन मुद्दों पर फोकस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। ऐसे में घपलों और घोटालों जिनमें इतनी बड़ी घोटाला है कि देखकर दिमाग चकराने लगता है। मीडिया ने इन घोटालों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट, आदर्श सोसायटी घोटाला, इन्कम टैक्स प्राधिकरण द्वारा यह पुष्टि कि गांधी परिवार के सबसे करीबी क्वात्रओची और विन चड्ढा को बोफोर्स से कमीशन मिला था, इसरो(भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संगठन जो सिधे प्रधानमंत्री के तहत आता है) द्वारा देवास मल्टी मीडिया को वाणिज्यिक उपयोग के लिए एस-बैंड स्पेक्ट्रम का दिया जाना, घोटालों और घपलों की ये चंद उदाहरण है। इन घोटालों के पर्दाफाश के कारण पहले ही केन्द्र सरकार के तीन मंत्री (शशि थरुर और ए राजा, दयानिधि मारन), और एक मुख्यमंत्री अशोक चव्हान सरकार से बाहर हो चुके हैं दूसरी तरफ भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोप में कर्नाटक के मुख्यमंत्री और पंजाब में दो मंत्रियों को हटाना पड़ा।

जहां तक काले धन का संबंध है, यह भी एक पूंजीवादी समाज के लिए अपरिहार्य है इस पैसे को बिजनेस के लोग, शासक राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह हमेशा ही विदेशी बैंकों में जमा कराने के तरीके पर चलते आये हैं। हवाला कारोबार विश्व भर के तमाम टैक्स हेवन देशों से कालेधन को इधर से उधर ले जाने का काम करने के आधार पर ही फलता-फुलता है। एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के अनुसार 1948 से 2008 के बीच, 900,000 करोड़ रुपये से अधिक धन भारत से बाहर गया है और स्विस बैंकों एवं अन्य समुद्र पार टैक्स हेवन देशों में जमा किया गया है। जर्मनी के एक बैंक ने वहां कालेधन का खाता रखनेवाले भारत के लोगों की सूची सरकार को दी है, पर वर्तमान सरकार उनके नाम जाहिर करने से इंनकार कर रही है। इसके अलावा, देश के अंदर काले धन की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था है, और अनुमान है कि वह वास्तविक अर्थव्यवस्था से काफी बड़ी है।

मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और काले धन- ये तमाम बातें व्यवस्था की विफलता, सरकार की दिवालियापन को व्यक्त करती है। किसी भी सरकार की विदेश नीति उसकी आंतरिक नीतियों का, खासकर आर्थिक नीतियों का विस्तार होती है, अत: अमरीकी साम्राज्यवादियों की जोड़-तोड़ के सामने अधिकाअधिक आत्मसमर्पण किया जा रहा है। ब्रिक्स और जी-20 के मंच पर हमारी सकारात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद, आर्थिक मोर्चे पर हम पश्चिम देशों की जोड़तोड़ एवं तिकड़मबाजी के सामने पहले ही लगभग आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शंघाई सहयोग परिषद में शामिल होने का भारत का फैसला स्वागत योग्य है क्योंकि यह हमें साम्राज्यवादी दवाबों का काउंटर करने में मदद कर सकता है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी हम अमरीका की ओर मार्ग दर्शन के लिए देख रहे है। ईरान से संबंधित अनेक मामलों में हम अमरीका निर्दिष्ट लाइन पर दस्तखत करते रहे हैं। यहां तक की हम लीबिया पर बमबारी करने की इजाजत देने वाले अमरीका-ब्रिटेन प्रायोजित प्रस्ताव का विरोध करने में भी विफल रहे।

आर्थिक एवं विदेशी नीतियों में जारी दक्षीणपंथी एवं अमरीका परस्त शिफ्ट को गंभिरता से लेने की जरुरत है और हमारी आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए इस बढ़ते खतरे के विरुद्ध जनता को जागरुक किया जाना चाहिए।