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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

यादों का पहला शहर - अकबरपुर


पार्ट-१

बिहार का नबादा जिला का छोटा सा कस्बा अकबरपुर कितना बदल गया है, नहीं बदली तो यहां की सकरी गलियां, तालाब, लोगों का अपनापन, प्यार और सादगी। इसलिए यह शहर मेरे दिल के बेहद करीब है। मेरे स्कूल के बचपन की यादें ,  दोस्त सब यहां से जुड़ा है।
बचपन की वो मस्ती याद आ रही है। मेरे दोस्त संदीप-कोशलेंद्र के साथ शैतानी याद आ रही है। बात-बात पर क्लास में झगड़ा करना । इस शहर में अपनेपन की खुशबू है। स्कूल के चार दिवारी के पीछे तालाब के किनारे बैठकर गपे हांकना. फिर भी समय बचे तो नदी के किनारे ढेला फेकना, कितने मस्त दिन थे वो।
बिच बाजार में जैबा मैया का मिठाई का दूकान हुआ करता था.जहाँ मिडिल स्कूल के सभी शिक्षकों का खाता चलता था.सभी सुबह-शाम चाय पीते और महिना के आखिरी में दरमाहा मिलने पर पैसा चुकाते.हॉस्टल में रहने वाले बच्चे कभी-कभी मिठाई खा कर किसी दुसरे के खाते में पैसा लिखा कर चलते बनते.  
मैंने अपने बचपन का 5 साल इस छोटे से कस्बा में गुजारा है यह बिहार और झारखण्ड के बॉर्डर पर बसा हुआ है. विकास के नाम पर बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका माना जाता था. मुख्य सड़क से करीब ५ किमी की दूरी पर अकबरपुर बसा था.यहाँ  मेरे नाना जी १९७५ से ही मिडिल स्कूल में टीचर के पद पर कार्यरत थे.और मै बचपन से ही नाना जी के साथ रहा इसलिए  मेरा दाखिला नाना जी ने अपने ही स्कूल में कटा दिया. .आज की तरह दिल्ली में रहने वाले माता-पिता की तरह दाखिला के लिए जोर अजमाइश नहीं करना पड़ा और 30 रुपए में दाखिला हो गया. स्कूल में हॉस्टल नहीं था बलिक टीचरों को रहने के लिए रेसिडेंस मिला हुआ था इसलिए मै भी नाना जी के साथ वहीं रहता था. पढ़ाई के लिए सुबह 3 बजे जगना होता था ऐसा लगता मानो सुबह में मैं एक घंटा पढ़ता तो विवेकानन्द बन जाता. पढ़ने को लेकर कई शर्त थी जैसे बेड पर नहीं पढना / बोरा बिछा कर जमीन पर पढ़ना/ तेज आवाज में पढना.  
दिन के उजाले के साथ दूसरी जंग की तैयारी होती थी.दूसरा जंग मैथ के साथ  लड़ने के लिए टिउसन पढने जाना होता था.आज सोचता हूँ की जोड़+गुना और भागा से ही सारा जिंदगी काम चल जाता है तो पता नहीं वर्गमूल,साइन थीटा,कॉश थीटा वगैरह-वैगरह क्यूँ पढाया जाता था.कई बार तो मास्टर साहब भी खीज जाते और कहते पता नहीं तुम्हारा दिमाग है या भूसा.

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

ले जा सब ले जा 
सब तेरा है 

ये जो रात है 

ये जो मेरा सवेरा है 

हाथ की हथेली से लकीर ले जा 

मेरी जमीन मेरा जमीर ले जा 

72 से हुई 78 धड़कन 

ले दिल-ए-अमीर ले जा 

ले जा सब ले जा 

सब तेरा है-----

नोट - (डॉक्टर के अनुसार दिल 72 बार धडकता है।।।।अब नया कानून बनने पर 78 बार )


शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

म्यांमार में लोकतंत्र का आगाज

भारत का पड़ोसी देश म्यांमार, जो 1991 तक बर्मा के नाम से जाना जाता था, धीरे-धीरे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। ऐसा वहां की संसद की 45 सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों से प्रतीत होता है। बर्मा की आजादी के जननायक जनरल आंग सान की पुत्री है सू की . 1947 में आजादी से महज छह महीने पहले ही सान की हत्या कर दी गयी थी. उस वक्त सू की की उम्र सिर्फ दो साल थी. 1960 में वह अपनी मां के साथ भारत चली आयीं, जहां उनकी मां को म्यांमार का राजदूत नियुक्त किया गया था।
भारत में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडीश्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. चार साल तक भारत रहने के बाद वह ब्रिटेन चली गयीं, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की. इसके बाद, 1988 में वह रंगून लौटीं. यह वह अवधि था, जब म्यांमार जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था. हजारों छात्र और बौद्ध देश में लोकतांत्रिक सुधार को लेकर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. 26 अगस्त 1988 को दिये अपने भाषण में उन्होंने खुद कहा, अपने महान पिता की बेटी होने के कारण मैं खुद को इन सबसे अलग नहीं कर पायी. इस तरह सू की म्यामांर की राजनीतिक उथल-पुथल में शामिल हो गयीं. उन्होंने तत्कालीन तानाशाह जनरल विन के खिलाफ प्रदर्शनकारियों का मोर्चा संभाल लिया.इस तरह से दशकों बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत वहां चुनाव हुए उससे तो यही कहा जा सकता है कि यह एक अथक संघर्ष की जीत है. म्यांमार को सैन्य शासन से लोकतंत्र की इस दहलीज पर लाने में नेता आंग सान सू की की भूमिका को नजरअंदाज एक इतिहास से नजरें चुराने जैसा होगा. अगर देखें तो नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की दक्षिणी अफ्रीकी नेता नेल्सन मंडेला की तरह एक शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन चुकी हैं। 1990 में बर्मा में स्वतंत्र चुनाव हुए थे, जिनमें सू की की पार्टी को जीत हासिल हुई थी लेकिन सैनिक तंत्र ने इसे नहीं माना। सेना खुद सत्ता पर काबिज रही। बर्मा के संविधान के अनुसार 664 सदस्यों वाली राष्ट्रीय असेंबली में दो तिहाई सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं। सेना ने पिछले साल फिर चुनाव कराये जिनका सू की की पार्टी ने बहिष्कार किया। लेकिन सेना ने नरम रुख अख्तियार करते हुए सिविलियन सरकार को सत्ता सौंप दी थी। फिर भी असली कमान सेना के ही हाथ में रही। बर्मा के राष्ट्रपति स्वयं एक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं। संसद की 45 सीटों के लिए उपचुनाव इसलिए कराने पड़े क्योंकि बर्मा के संविधान के अनुसार कोई मंत्री संसद सदस्य नहीं हो सकता। सेना में सेना समर्थित पार्टी यू.एस.डी.पी. का पहले से ही बहुमत है। वर्षों नजरबंद रहने वाली बर्मा की लोकप्रिय जन नेता सू की अपनी पार्टी की मात्र 10 प्रतिशत सीटों के बल पर कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पायेगी। सैन्य शासन के कारण पश्चिमी देशों की तरफ से बर्मा पर कई तरह के आर्थिक व अन्य प्रतिबंधों के कारण बर्मा के सैन्य तंत्र को दबाव में झुकना पड़ा। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि बर्मा ने लोकतंत्र की दहलीज पर पांव रख दिये हैं। बर्मा भारत का एक ऐसा पड़ोसी देश है जो 1937 तक भारत का ही एक अंग था, भारत अब यह उम्मीद कर सकता है कि बर्मा में उल्फा और नगा विद्रोहियों के कैंपों को समेटने में सू की के प्रभाव से कुछ मदद मिलेगी और वहां की सरकार भारत के साथ अपने संबंधों को सुधारने की ओर प्रयासरत होगी। बर्मा में अब सबसे ज्यादा जरूरी है संविधान संशोधन ताकि वहां आम चुनाव का रास्ता साफ किया जा सके।


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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

भाजपा और कांग्रेस एक ही हाइवे पर

अभी तक आपने सदन में चर्चा के दौरान सांसदों को एक दूसरे पर चिल्लाते, गुर्राते, हाथ लहराकर चुनौती देते और जबानी ल़ड़ाई में भि़ड़ते तो अक्सर देखा है, लेकिन कर्नाटक में देश के सबसे अनुशासित और चाल, चरित्र चेहरे वाली मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के सहकारिता मंत्री विधानसभा में कार्यवाही के दौरान मोबाइल पर अश्लील चित्र देखते हुए कैमरे में कैद हो गए इस घटना को मीडिया के द्वारा उजागर किये जाने के बाद भाजपा के शीर्ष अधिकारियों ने तीनो मंत्रियों से इस्तीफा तो ले लिया है लेकिन क्या इस्तीफा ले लेने से भाजपा के चेहरे पर लगे दाग धूल जायगा.?
दरसल केंद्र मे जो स्थिति कांग्रेस की है वही राज्यों के स्तर पर भाजपा की है दोनों पार्टियाँ चुनाव प्रचार के समय तो एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती है लेकिन दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार करने के मामले में एक-दूसरे को पीछे छोड़ रही है केंद्र में राज्य करने वाली कांग्रेस ने जहाँ २ जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेलों में लूट, आदर्श सोसायटी घोटाला, और इसरो जैसे घोटाले की लम्बी सूची को अपने खाते में सजा कर रखी वही भाजपा के सबसे चहेते मुख्य मंत्री वी एस यदुरप्पा और उतराखंड में रमेश पोखरियाल को भ्रष्टाचार के मामले में अपनी कुर्सी गवांनी पड़ीकर्नाट में अवैध खनन के घिनौने खेल में क्या बीजेपी और काँग्रेस सभी का चेहरा दागदार है. भ्रष्टाचार के मामले में मूख्य रूप से दोनों राष्ट्रीय पार्टियाँ एक हीं हाइवे पर अपनी गाडी को हांक रहें हैं

हाल में २ जी स्पेक्ट्रम के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आया उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियाँ प्रचार में अपने आप को हरिश्चंद्र बताने लगी. लेकिन ये कौन नहीं जानता की भ्रष्टाचार के नाम पर संसद से लेकर टी.वी पर जिस पार्टी के नेता सबसे ज्यादा अपने आपको हरिश्चंद्र बता रहे थे उसी पार्टी के मुखिया ने उत्तर प्रदेश में बाबु सिंह कुशवाहा को गले लगा कर भ्रष्टाचार की मुहीम पर ब्रेक लगा दिया.

भ्रष्टाचार इस देश को किस तरह घून की तरह खाये जा रहा है उसका सबसे बड़ा उदाहरण तो हमारे विधायक और सांसद हैंसभी जानते हैं कि उनको अपने कार्य के लिये कितना वेतन और भत्ता मिलता है ? परन्तु देखते ही देखते ही देखते उनके महल खड़े हो जाते हैं, करोड़ों की अचल सम्पत्ति बन जाती है और अच्छा-खासा बैंक बैलेंस जमा हो जाता है आश्चर्य की बात तो यह है कि लोग इस विषय में ऐसे बात करते हैं कि जैसे यह एक आम बात हो जिस जनता ने उनको चुनकर संसद या विधानसभा तक पहुँचाया है, वहां प्रश्न तक नहीं करती कि उनके पास इतना धन आया कहाँ से ? लोग यह भी नहीं सोचते कि जो पैसा आम जनता से कर के रूप में वसूला जाता है, देश के विकास के लिये, उसका न जाने कितना बड़ा हिस्सा तो इन लोक प्रतिनिधियों के जेब में चला जाता है.

भ्रष्टाचार के इस रोग के कारण हमारे देश का कितना नुकसान हो रहा है, इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है. पर इतना तो साफ़ दिखता है कि सरकार द्वारा चलाई गयी अनेक योजनाओं का लाभ लक्षित समूह तक नहीं पहुँच पाता है इसके लिये सरकारी मशीनरी के साथ ही साथ जनता भी दोषी है सूचना के अधिकार का कानून बनने के बाद कुछ संवेदनशील लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामने आये हैं, जिससे पहले से स्थिति सुधरी है. पर कितने प्रतिशत ? यह कहना मुश्किल है. जिस देश में लोगों द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही लोगों का पैसा खाने के लिये तैयार बैठे हों, वहाँ इससे अधिक सुधार कानून द्वारा नहीं हो सकता है

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

चुनाव में पर्यावरण बन पाएगा विकास का मुद्दा ?

पाँच राज्यों में हो रहे चुनावों में अलग-अलग राजनैतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में अपने कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है। हमेशा की तरह वोटरों को सपने दिखाये जा रहे हैं। कोई विजन की बात कर रहा है तो कोई मन्दिर बनाने की, दिखाने को नारे, झण्डे और प्रतीक भले ही अलग-अलग हैं पर सब की कार्यशैली लगभग एक सी है। विकास के मुद्दे चुनाव प्रचार में छाए हुए हैं, शुद्ध पर्यावरण की बात कोई नहीं कर रहा है कहावत भी है 'जैसा खाए अन्न, वैसा होये मन' जैसा पीये पानी, वैसी बोले वाणी। ऐसे में आज प्रदूषित वातावरण में लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है पूरी दुनिया आज पर्यावरण के संकट से जूझ रही है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है हरित या साफ-सुथरी तकनीक का विकास और उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचलन। इस दिशा में भारत जैसे विकासशील देश भी अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते

दरअसल
, आज हमारी समूची राजनीति ही लोकविमुख और पथभ्रष्ट हो चुकी है। यही वजह है कि लोक से जुड़े पर्यावरण जैसे अहम मसलों को अकादमिक या बौद्धिक विमर्श का विषय मान लिया गया है
और न ही ऐसे मसलों को लेकर कोई राजनीतिक दल जनांदोलन छेड़ते हैं। विभिन्न राज्यों में हो रहे चुनाव को लेकर राजनितिक पार्टियाँ अपने घोषणा पत्र में वोटरों को लुभाने के लिए कई तरह के वादें कर रही है कोई २४ घंटे बिजली देने , तो कोई रोजगार के लिए कम्पनियों को लाने, आधुनिक शहर बनाने, पेरिस और लन्दन की तर्ज पर सड़के बनाने की बात कर रही है और इन सारी सुविधाओं के लिए जंगल से लेकर जंगली जानवर और पारम्परिक जल सोत्र सबको नष्ट करते जा रहें है.यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। शहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित वायु और ये दूषित हवा हमारे फेफड़ों में जाती है जिसके कारण दमा जैसी गंभीर सांस की बीमारी होती है कुछ ऐसे हीं श्वास के रोग और भी हैं जिनका इलाज़ संभव नहीं हैआज सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के जरूरी उपाय पर किसी राजनितिक पार्टी के पास कोई रणनीति नहीं है परिवहन व्यवस्था भ्रष्टाचार, अक्षमता, विलम्ब और अविश्वसनीयता की शिकार है। इसी कारण शहरों में बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं इन इलाकों में वाहनों से होने वाले प्रदुषण का स्तर भी हर समय काफी उंचा होता है

आज इतने सालों के बाद भी हमारे नेता साफ़ पानी तक उपलब्ध नहीं करा पाए देश में 75 प्रतिशत लोग अशुद्ध जल पीने को मजबूर है जो देश में व्याप्त अधिकतर महामारी की जड़ है छुआछूत की 20 प्रतिशत बिमारी दूषित पानी से हो रही है। 11 करोड़ घरों में एवं 30 प्रतिशत विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद 1 लाख से अधिक लोग आज भी मैला उठाने का कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसे दूर करने के लिए इन नेताओं के पास कोई रणनीति नहीं है और यह चुनाव का मुद्दा भी नहीं बनता ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है

ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है.
पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है। ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जाता रहे हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नहीं पता.ऐसे में हम खतरे को देखकर आँख बंद करने की गलती कर रहे हैं. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसके अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं
यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

संकट में भारतीय पक्षी

मेरा बचपन गॉव में बिता है। मैं जुताई के खेतों में घंटों घुटनों तक गीली मिटटी में किसानो के साथ रहने का मजा भी उठाया है और डीजल इंजन के धक्-धक् करते सुरमय संगीत के बीच न कम होने वाली पानी की मोटी धार के बीच नहाने का मजा भी उठाया है। गर्मीं के दिनों में पक्के आम के लालच में एक बगीचे से दुसरे बगीचे चक्कर लगाना यह सोच कर आज भी मेरा मन रोमांच से भर उठता है। दो मंजिले छत पर धुप में बैठ कर खाना खाने का मजा ही कुछ और था, कई बार तो खाने की प्लेट से कौए रोटी लेकर भाग जाते और थोड़ी ही दूरी पर इठलाती और चिढाती हुई खाती. एक लम्बे अरसे के बाद जब घर आया हूँ, तो वो चहकती-फुदकती हर जगह दिखाई देने वाली, हमारे घर आगन में फुदकती प्यारी सी और कोमल सी चिड़ियाँ कहीं नहीं दिख रही है। शैशवावस्था से इनको आकाश में उड़ते देखने के कारण जो प्रेरणा मिलती रही है, उसी का परिणाम है कि हर किसी को उड़ने की इच्छा होती है। कौए, गौरैए, मैना, तोता जैसे पक्षी का पारिवारिक माहौल में घुलने-मिलने के बाद इनकी संख्या का कम होना अखरने लगा है। वर्षों पहले तो इन पक्षियों का झुण्ड हमारे घरों ,सार्वजनिक स्थ्लों, चौक, चबूतरों, खिडकियों यहाँ तक की कमरों के अन्दर भी देखे जा सकते थे। उसका फुदकना और चहचहाना हर किसी का मन मोह लेता है। हमारे बचपन की बहुत सी यादें इन नन्ही सी चिड़ियों के अठखेलियों से जुडी हुई है। लेकिन आज इसकी संख्या बहुत तेजी से कम होते जा रही है और इसके विलुप्त होने का खतरा मडरा रहा है। शहरीकरण से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और पक्षियों के घोंसलों के लिए पेड़ भी नहीं बच रहे हैं। इसके अलावा मकानों में बिजली, केबल आदि के तारों का इस तरह जाल बिछा है कि गौरैया जैसे पक्षियों के लिए उड़ना मुश्किल होता जा रहा है। आधुनिक युग में रहन-सहन और वातावरण में आ रहे बदलावों के कारण गौरैया पर कई ख़तरे मंडरा रहे हैं। सबसे प्रमुख ख़तरा उसके आवास स्थलों का उजड़ना है। आज हमारे घरों में आंगन होते ही कहां हैं, फिर बेचारी गौरैया घोंसला बनाए कहां? आधुनिक युग में पक्के मकानों की बढ़ती संख्या एवं लुप्त होते बाग़-बग़ीचे भी उसके आवास स्थल को छीन रहे हैं। इसके अलावा भोजन की कमी भी गौरैया के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है। भारत के आलावा और कई देशों में पायी जाने वाली इन पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है। इसके आलावा भी अन्य भारतीय पक्षी जैसे गिद्ध जो पर्यावरण का सबसे बड़ा हितैषी और कुदरती सफाईकर्मी के रूप में जाना जाता है जो धरती पर पड़े लावारिश पशु-पक्षियों के शवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। इतना ही नहीं, ये गिद्ध शाकाहारी भोजन का कचरा भी मज़े से खा लेते हैं। लेकिन अब गिद्ध प्रजाति संकट में हैं। शहरों में तथा बड़ी आबादी वाले गांव में तो गिद्ध के दर्शन भी दुर्लभ हो चुके हैं। इस समय देश में गिद्धों की नौ प्रजातियों की जानकारी है। जिनमें से अधिकांश उत्तराखंड में मिलती है। हिमालयन ग्रिफन, व्हाईट वेक्ड, सिलेन्डर बिल्ड, रैड हैडेड, इजिप्सियन, सिनेरियस, ला मरगियर और लौंग बिल्ड प्रमुख है। इनमें से लौंग बिल्ड और सिलेन्डर बिल्ड प्रजाति समाप्त होने के कगार पर है। एक अनुमान के मुताबिक अस्सी के दशक में देश में आठ करोड गिद्व थे। लेकिन अब इनकी सख्या बमुशिकल कुछ हजार ही रह गई है। विलुप्त हो रहे इन गिद्धों को बचाने के लिए सरकार देश में तीन गिद्ध संरक्षण प्रजनन केन्द्र चला रही है। जो पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल) व रानी (असम) में स्थापित हैं। मगर ये सभी योजनाएं गिद्धों को बचाने में नाकाफी साबित हो रही हैं। जंगल के इस सफाईकर्मी की घटती संख्या से वन्य जीवों समेत मानव की जान पर खतरा मंडराने लगा है। जिससे वाइल्ड लाइफ प्रेमी काफी चिंतित हैं। देश के शहरी व ग्रामीण इलाकों में अगर गिद्धों की चहल-पहल देखनी है तो इनके संरक्षण के लिए हमें आगे आना होगा। नही तो मानव का सच्चा हितैषी विलुप्त हो जाएगा और हमें तरह-तरह की भयंकर बीमारियों से दो चार होना पड़ेगा। जिसके लिए हम खुद जिम्मेदार होंगें।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

लड़कियों के सिगरेट पीने के 10 बहाने

राहुल कुमार :
सिगरेट पीती लड़कियां आपने देखी होंगी। आपको क्या लगता है, ये लड़की लोग सिगरेट पीती क्यों हैं? उससे भी बड़ा सवाल - क्या उनको सिगरेट पीनी चाहिए?इस पर एक लंबी-चौड़ी बहस चल सकती है। वैसे कई लोग इस पर बहस करना भी नहीं चाहेंगे क्योंकि उनके लिए लड़कियों के सिगरेट पीने या न पीने से ज्यादा एंटरटेनिंग लड़कियों से ही जुड़ी दूसरी बातें हैं।अपन लोग भी यहां बहस नहीं करेंगे क्योंकि बहस होनी है तो इस पर हो कि सिगरेट पी जानी चाहिए या नहीं। इस पर नहीं कि मर्द तो सिगरेट पी सकते हैं लेकिन लड़कियां नहीं पीएं। देश-दुनिया में मर्दों का सिगरेट पीना इतना आम और स्वाभाविक टाइप है कि वे ऑफिस की व्यस्तता में बड़े आराम से और बिना किसी संकोच के कॉलीग्स से कहते हैं - आता हूं कुछ देर में। ये कह कर वे सीढ़ियां उतर कर चौड़े में सुट्टा मारते हैं और फिर ऊपर आकर 'व्यस्त' हो जाते हैं। इसे कहते हैं सुट्टा ब्रेक। लेकिन लड़कियां खुलेआम सुट्टा ब्रेक नहीं ले सकतीं। उन्हें सिगरेट पीने के लिए बहाने बनाने पड़ते हैं? ये वे बहाने हैं जो अभी यूनिवर्सिली अक्सेप्टेड भले ही न हुए हों, दिल्ली, मुंबई या भोपाल में एकाध परिवर्तन के साथ चलन में आते जा रहे हैं।
बहाना नंबर 1 - 'पैरेंट्स ने पॉकेट मनी कम कर दी है... मोबाइल बिल हर महीने बढ़ जाता है तो मैं क्या करूं? नेटवर्किंग अभी से नहीं करूंगी तो क्या बुढ़ापे में करूंगी? हद है...दिमाग भन्ना रहा है॥इन ओल्डीज को कौन समझाए यार॥ We do have some needs...ला यार, आज मैं भी एक पी ही लूं।' (करियर की जद्दोजहद में पड़ी युवा लड़कियों का अक्सर का बहाना। यह बहाना काफी पुराना है वैसे। हालांकि इस तरह के अब के चलन में होने न होने को ले कर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता।)
बहाना नंबर 2- स्किन का ध्यान रखना चाहिए। कॉफी और चाय बार-बार नहीं पीनी चाहिए। ड्राई हो जाती है। होंठ भी काले होने लगते हैं। बार बार टी- कॉफी की तलब लगे तो क्या करूं? सिगरेट ही पी आती हूं।
बहाना नंबर 3 - जिन्दगी में कुछ बचा नहीं है जिसकी परवाह करूं। किसी से बात करने का मन नहीं करता। दरअसल, बात करने लायक लोग आसपास हैं ही कहां। हर कोई मतलब का यार है। किसी की चुगली करने से बेहतर है... अकेले कोने में जा कर सुट्टा लगाना।
बहाना नंबर 4 - सुबह-सुबह 'प्रेशर' नहीं बनता। पांच गहरे कश अंदर और....।बहाना नंबर 5 - टशन। (यह बहाना कम सच्चाई अधिक है। ग्लोबल परिप्रेक्ष्य में न लें, तो हर लड़की पहली बार स्मोक करते समय कहीं न कहीं इस टशन-इफेक्ट से प्रभावित होती है। जिन महिलाओं ने जीवन में केवल एक ही बार सुट्टा मारा है, उनसे पूछें तो वे इसी टशन-इफेक्ट की लपेट में आईं थीं। विमिन स्मोकर्स इस बात को खुले में कभी नहीं स्वीकारेंगी कि वे स्मोकिंग करते हुए टशन (स्टाइल) का खास ख्याल रखती हैं। )बहाना नंबर 6 - ऑफिस का सुट्टा ब्रेक। ये बगल में बैठा गंजा मोटा चोख्खा दिन भर सिस्टम पर मैट्रिमोनियल खंगालता है और सुट्टा ब्रेक ऐसे लेता है जैसे खूब काम करके आया हो...तो मैं (या हम) क्यों न लेकर आएं सुट्टा ब्रेक।
बहाना नंबर 7 - 'पुलिसवालों से अंदर की खबर लेनी होती हैं... क्राइम रिपोर्टिंग में बिंदास होना जरूरी है... बहन जी टाइप नहीं चलेगी... इसलिए दिन भर चाहे सिगरेट पिऊं या नहीं, पर दुनिया के सामने पीते हुए दिखना जरूरी है।'
बहाना नंबर 8 - आज बहुत टेंशन में हूं। अकेले बैठना चाहती हूं। कुछ देर। मैं और मेरी सिगरेट... ( यह बहाना जेंडर-न्यूट्रल है यानी मर्द भी इसका इस्तेमाल करते हैं लेकिन शराब पीने के लिए। अल्कोहल, स्मोकिंग और टेंशन का रिश्ता तो प्राचीनतम है। याद करें देवदास।)

बहाना नंबर 9 - 'इंक्रीमेंट हुआ है... बर्थडे है... एग्ज़ाम क्लियर हो गया... मूड मस्त है... बाल -बाल बचे रे'॥ आदि इत्यादि। (यानी, कोई भी ऐसी खुशी जो डाउटफुल थी।)
बहाना नंबर 10 - 'बहाना? वॉट रबिश। मुझे किसी बहाने की ज़रूरत नहीं। जब मन करता है, सुलगा लेती हूं। 'Am not a kid darling।'वाकई कई लोगों को कुछ भी करने के लिए किसी भी बहाने की जरूरत नहीं होती। जिन्हें होती है, वे देते होंगे। पर क्या आपने सोचा है कि महिलाओं को एक सिगरेट जलाते समय बहाना बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? आसपास के लोग उन्हें सिगरेट सुलगाते देख चुके होते हैं, फिर भी उन्हें क्यों एक्सक्यूज़ देना पड़ता है? कई बार तो ये एक्सक्यूज़ खुद से भी देती हैं लड़कियां... क्या इसलिए कि कहीं न कहीं अपराध या संकोच बोध जड़ा होता है मन में? मन में यह डर भी कि देखनेवालों की निगाह में अब वे अच्छी लड़की नहीं रहेंगी? यह अपराध या संकोच का भाव किसी पुरुष में कभी पैदा नहीं होता, जबकि, सिगरेट का हरेक कश एक औरत के लिए भी अस्वास्थ्यकर है और पुरुष के लिए भी।