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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

लड़कियों के सिगरेट पीने के 10 बहाने

राहुल कुमार :
सिगरेट पीती लड़कियां आपने देखी होंगी। आपको क्या लगता है, ये लड़की लोग सिगरेट पीती क्यों हैं? उससे भी बड़ा सवाल - क्या उनको सिगरेट पीनी चाहिए?इस पर एक लंबी-चौड़ी बहस चल सकती है। वैसे कई लोग इस पर बहस करना भी नहीं चाहेंगे क्योंकि उनके लिए लड़कियों के सिगरेट पीने या न पीने से ज्यादा एंटरटेनिंग लड़कियों से ही जुड़ी दूसरी बातें हैं।अपन लोग भी यहां बहस नहीं करेंगे क्योंकि बहस होनी है तो इस पर हो कि सिगरेट पी जानी चाहिए या नहीं। इस पर नहीं कि मर्द तो सिगरेट पी सकते हैं लेकिन लड़कियां नहीं पीएं। देश-दुनिया में मर्दों का सिगरेट पीना इतना आम और स्वाभाविक टाइप है कि वे ऑफिस की व्यस्तता में बड़े आराम से और बिना किसी संकोच के कॉलीग्स से कहते हैं - आता हूं कुछ देर में। ये कह कर वे सीढ़ियां उतर कर चौड़े में सुट्टा मारते हैं और फिर ऊपर आकर 'व्यस्त' हो जाते हैं। इसे कहते हैं सुट्टा ब्रेक। लेकिन लड़कियां खुलेआम सुट्टा ब्रेक नहीं ले सकतीं। उन्हें सिगरेट पीने के लिए बहाने बनाने पड़ते हैं? ये वे बहाने हैं जो अभी यूनिवर्सिली अक्सेप्टेड भले ही न हुए हों, दिल्ली, मुंबई या भोपाल में एकाध परिवर्तन के साथ चलन में आते जा रहे हैं।
बहाना नंबर 1 - 'पैरेंट्स ने पॉकेट मनी कम कर दी है... मोबाइल बिल हर महीने बढ़ जाता है तो मैं क्या करूं? नेटवर्किंग अभी से नहीं करूंगी तो क्या बुढ़ापे में करूंगी? हद है...दिमाग भन्ना रहा है॥इन ओल्डीज को कौन समझाए यार॥ We do have some needs...ला यार, आज मैं भी एक पी ही लूं।' (करियर की जद्दोजहद में पड़ी युवा लड़कियों का अक्सर का बहाना। यह बहाना काफी पुराना है वैसे। हालांकि इस तरह के अब के चलन में होने न होने को ले कर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता।)
बहाना नंबर 2- स्किन का ध्यान रखना चाहिए। कॉफी और चाय बार-बार नहीं पीनी चाहिए। ड्राई हो जाती है। होंठ भी काले होने लगते हैं। बार बार टी- कॉफी की तलब लगे तो क्या करूं? सिगरेट ही पी आती हूं।
बहाना नंबर 3 - जिन्दगी में कुछ बचा नहीं है जिसकी परवाह करूं। किसी से बात करने का मन नहीं करता। दरअसल, बात करने लायक लोग आसपास हैं ही कहां। हर कोई मतलब का यार है। किसी की चुगली करने से बेहतर है... अकेले कोने में जा कर सुट्टा लगाना।
बहाना नंबर 4 - सुबह-सुबह 'प्रेशर' नहीं बनता। पांच गहरे कश अंदर और....।बहाना नंबर 5 - टशन। (यह बहाना कम सच्चाई अधिक है। ग्लोबल परिप्रेक्ष्य में न लें, तो हर लड़की पहली बार स्मोक करते समय कहीं न कहीं इस टशन-इफेक्ट से प्रभावित होती है। जिन महिलाओं ने जीवन में केवल एक ही बार सुट्टा मारा है, उनसे पूछें तो वे इसी टशन-इफेक्ट की लपेट में आईं थीं। विमिन स्मोकर्स इस बात को खुले में कभी नहीं स्वीकारेंगी कि वे स्मोकिंग करते हुए टशन (स्टाइल) का खास ख्याल रखती हैं। )बहाना नंबर 6 - ऑफिस का सुट्टा ब्रेक। ये बगल में बैठा गंजा मोटा चोख्खा दिन भर सिस्टम पर मैट्रिमोनियल खंगालता है और सुट्टा ब्रेक ऐसे लेता है जैसे खूब काम करके आया हो...तो मैं (या हम) क्यों न लेकर आएं सुट्टा ब्रेक।
बहाना नंबर 7 - 'पुलिसवालों से अंदर की खबर लेनी होती हैं... क्राइम रिपोर्टिंग में बिंदास होना जरूरी है... बहन जी टाइप नहीं चलेगी... इसलिए दिन भर चाहे सिगरेट पिऊं या नहीं, पर दुनिया के सामने पीते हुए दिखना जरूरी है।'
बहाना नंबर 8 - आज बहुत टेंशन में हूं। अकेले बैठना चाहती हूं। कुछ देर। मैं और मेरी सिगरेट... ( यह बहाना जेंडर-न्यूट्रल है यानी मर्द भी इसका इस्तेमाल करते हैं लेकिन शराब पीने के लिए। अल्कोहल, स्मोकिंग और टेंशन का रिश्ता तो प्राचीनतम है। याद करें देवदास।)

बहाना नंबर 9 - 'इंक्रीमेंट हुआ है... बर्थडे है... एग्ज़ाम क्लियर हो गया... मूड मस्त है... बाल -बाल बचे रे'॥ आदि इत्यादि। (यानी, कोई भी ऐसी खुशी जो डाउटफुल थी।)
बहाना नंबर 10 - 'बहाना? वॉट रबिश। मुझे किसी बहाने की ज़रूरत नहीं। जब मन करता है, सुलगा लेती हूं। 'Am not a kid darling।'वाकई कई लोगों को कुछ भी करने के लिए किसी भी बहाने की जरूरत नहीं होती। जिन्हें होती है, वे देते होंगे। पर क्या आपने सोचा है कि महिलाओं को एक सिगरेट जलाते समय बहाना बनाने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? आसपास के लोग उन्हें सिगरेट सुलगाते देख चुके होते हैं, फिर भी उन्हें क्यों एक्सक्यूज़ देना पड़ता है? कई बार तो ये एक्सक्यूज़ खुद से भी देती हैं लड़कियां... क्या इसलिए कि कहीं न कहीं अपराध या संकोच बोध जड़ा होता है मन में? मन में यह डर भी कि देखनेवालों की निगाह में अब वे अच्छी लड़की नहीं रहेंगी? यह अपराध या संकोच का भाव किसी पुरुष में कभी पैदा नहीं होता, जबकि, सिगरेट का हरेक कश एक औरत के लिए भी अस्वास्थ्यकर है और पुरुष के लिए भी।

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

घाना में कलरव करते सायबेरियन पक्षी

कहा जाता है की प्रकृति माँ सबसे सुन्दर होती है और मै वही सुन्दरता को अपनी आँखों से देखने की चाहत में भरतपुर उद्यान जा पहुंचे प्रकृति के नज़ारे को करीब से देखने के लिए हम सब हमेशा लालायित रहते है, लेकिन इस नज़ारे को देखने के लिए समय निकालना आसान नहीं होता। कभी प्रकृति को देखने का मौसम नहीं है, तो कभी समय का अभाव। अगर आप भी बाघों और अपनी दुनिया में मस्ती करते अन्य जंगली जीव-जंतुओं को देखना चाहते हैं तो भरतपुर पक्षी अभयारण्य आपके लिए अच्छी जगह हो सकता है। केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान में प्रकृति और मानव इतिहास का नाता करीब 250 वर्ष पुराना है। सन् 1745 में गंभीर और बाणगंगा नदी के मिलन स्थान पर बनी छिछली जगह में भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने बारिश के मौसम में बरसने वाले पानी पर अजान बांध बनवाया और प्राक्रतिक गहराई में पानी भरने से यह स्थान विकसित हुआ। यहां पर बाढ़ के कारण छिछला आर्द्र पारिस्थितिकीय तंत्र बना, जो विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों के लिए एक बेहतर निवास स्थान बन गया। नमभूमि वाला यह क्षेत्र रामसर स्थली भी है और इसे प्राकृतिक विश्व धरोहर भी घोषित किया गया है। भरतपुर शहर से दो किलोमीटर दूरी पर घाना पक्षी अभयारण्य पहले भरतपुर राजपरिवार की शिकारगाह हुआ करता था। इस स्थान को सन् 1956 में पक्षी अभयारण्य और सन् 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया, जबकि 1985 में इसे विश्व विरासत का दर्जा मिला। यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान पक्षी संसार का स्वर्ग है तो पक्षी प्रेमियों का तीर्थ। पक्षियों की दुनियाँ भी वड़ी विचित्र होती है।
यह प्रकृति पदत्त सबसे सुन्दर जीवों की श्रेणी में आते हैं। इनसे मानव के साथ रिश्तों की जानकारी के उल्लेख प्राचीनतम ग्रंथों में भी मिलते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान में सुंदर पक्षियों के 375 से अधिक प्रजातियों का बसेरा है। इनमें से 132 से अधिक यहीं पर अपने परिवार को बढ़ाते हैं। यहां केवल देश से, बल्कि यूरोप, साइबेरिया, चीन और तिब्बत से भी पक्षी आते हैं। मानसून में यहां साइबेरियाई बार हेडेडगूंज, कोमन क्रेन, चीन का चायनाकूट, साइबेरियाई पिंकटेल, मंगोलियाई सोबलर, पेलिकन, श्रीलंकाई ब्लेकनेक स्टॉर्क सहित सांभर को भी देखा जा सकता है। पक्षियों की प्रवास यात्राएं सबसे लंबी, चुनौती भरी और विलक्षण होती है। इन पक्षियों के प्रवास-यात्राओं पर जाने के अनेक कारण हैं, जिनमें से मुख्य हैं मौसम में असहनीय परिवर्तन और भोजन की कमी। प्रकृति की अनुपम देन पंखों की सहायता से वे संसार के एक क्षोर से दुसरे क्षोर तक यात्रा सुगमता पूर्वक कर लेते हैं। इनकी सबसे प्रसिद्ध यात्रा उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिण की तरफ की है। गृष्म काल में तो उत्तरी गोलार्द्ध का तापमान ठीक-ठीक रहता है, पर जाड़ों में ये पूरा क्षेत्र बर्फ से ढ़ंक जाता है। तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। इस क्षेत्र में पक्षियों के लिए खाने-पीने और रहने की सुविधाओं का अभाव हो जाता है। ऐसी परिस्थित में उनका जीना मुश्किल हो जाता है। फलतः वे आश्रय की तलाश में गर्म हिस्सों में प्रवास कर जाते हैं। गर्मियों में जब बर्फ़ पिघलती है और वनस्पतियां उगने लगती हैं तो भरपूर भोजन और खुले माहौल का आनंद उठाने ये फिर वापस लौट जाते हैं। पिछले सालो की तुलना में इस साल विदेशी मेहमानों की संख्या में थोड़ी कमी आई है जिसके कारण यहाँ घुमने आने वाले सैलानियों की तादाद कम हो गयी है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है। मौसम मे परिवर्तन प्रवासी पक्षियों को रास नहीं आता इस कारण वे अब मुंह मोड़ने लगे हैं जलवायु परिवर्तन से पक्षियों का प्रवास बहुत प्रभावित हुआ है। पहले पूर्वी साइबेरिया क्षेत्र के दुर्लभ पक्षी मुख्यतः साइबेरियन सारस भारत में आते थे।
जलस्रोतों के सूखने से उनके प्रवास की क्रिया समाप्त हो गई है।
ये सुदूर प्रदेशों से अपना जीवन बचाने और फलने फूलने के लिए आते रहे हैं। पर हाल के वर्षों में इनके जाल में फांस कर शिकार की संख्या बढ़ी है। कई बार तो शिकारी तालाब या झील में ज़हर डाल कर इनकी हत्या करते हैं। माना जाता है कि उनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है तथा उच्च वर्ग में इसका काफ़ी मांग होती है। अब वे चीन की तरफ जा रहे हैं। हम एक अमूल्य धरोहर खो रहे हैं। पक्षियों के प्रति लोगों में पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना चाहिए। पक्षी विहार से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा काफी बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को दखने पर्यटक आते हैं। घना में करीब 29 वर्ग किलोमीटर में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान पूरे साल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। विदेशी पर्यटकों के लिए 200 रुपए और भारतीयों के लिए 25 रुपए प्रति व्यक्ति का टिकट है। यहां उद्यान में वाहन से शांति कुटीर तक जाने की व्यवस्था है, जो गेट से 17 किलोमीटर है। इसके लिए 50 रुपए प्रति वाहन शुल्क अलग से लगता है।
यहाँ कैसे पहुंचे :-
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान दिल्ली से १७६ किमी और जयपुर से १७६ किमी की दूरी पर है. भरतपुर आगरा , दिल्ली और जयपुर से सड़क और रेल मार्ग से भी जुड़ा हुआ है. भरतपुर रेलवे स्टेशन से पार्क की दूरी ६ किमी है
घुमने के लिए बेहतर समय:
यह राष्ट्रीयन उद्यान पुरे साल घुमने वालो के लिए खुला रहता है लेकिन प्रवासी पक्षियों के देखने के लिहाज से नवम्बर से लेकर मार्च तक का महिना उपुक्त रहता है

औली यानि भारत में स्विट्ज़रलैंड का मजा

हिमालय पर्वत की बर्फ से लदी ऊँची पर्वत चोटियाँ सदैव से ही यहाँ आने वाले पर्यटकों को आकर्षित एवं उत्साहित करती रही है। उतराखंड राज्य की भूमि से प्रमुख रूप से भारत वर्ष की दो अति पावन और पवित्र नदियाँ,गंगा और यमुना का उदगम हुआ है। इसी अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता को निहारने की चाहत में हम उतराखंड जा पहुँचे। शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी से दूर औली एक बहुत ही बेहतरीन पर्यटक स्थल है।ऊँचे ऊँचे आसमान छूते सफ़ेद चमकीले पहाड़ मीलों दूर तक फैली सफ़ेद बर्फ की चादर दूर-दूर तक दिखते बर्फीली चोटियों के दिलकश नज़ारे ! नहीं भई.... इसके लिए स्विट्जर्लेंड जाने की जरुरत नहीं ऐसी जगह तो हमारे पास भी मौजूद है हम बात कर रहे हैं औली की जो की उत्तराखंड में है। औली इन दिनों पर्यटकों के लिए सबसे पसंदीदा जगह बन गया है. प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत यह जगह भारत का सबसे पोपुलर टूरिस्ट प्लेस है. उतराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के पास समुद्र तल से ९००० हजार फिट की ऊँचाई पर यह स्थित है. जोशीमठ से औली जाने के लिए दो रास्ते है एक तो सड़क का और दूसरा रोपवे का, करीब चार किलोमीटर लम्बे रोपवे से जाने पर इस जन्नत का नज़ारा और भी खूबसूरत हो जाता है। जोशी मठ से कुछ ही दूरी पर चिनाब झील है इस स्थान तक पहुंचने के लिए घने जंगल और मखमली घास के मैदान से होते हुए जाना पड़ता है।
औली की तरफ पर्यटकों की रुख सबसे बड़ी वजह स्क्यिंग के लिए पहाड़ों के बेहतरीन ढलाने है. ये ढलाने दिसम्बर के मध्य से अप्रैल तक सफेद कालीन जैसी बर्फ की मोटी चादर से ढकी रहती है. ढलानों पर जमीं बर्फ और ओक के जंगल स्कीईंग के दीवानों के दिल जित लेते है. जिन लोगों ने कभी स्कीइंग करने या सीखने के अरमान संजोये रखा हो, उनके लिए यह बहुत अच्छी जगह है.यहाँ गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने स्की सिखाने की व्यवस्था की है। मण्डल द्वारा 7 दिन के लिए नॉन-सर्टिफिकेट और 14 दिन के लिए सर्टिफिकेट ट्रेनिंग दी जाती है। यह ट्रेनिंग हर वर्ष जनवरी-मार्च में दी जाती है नंदा देवी के पीछे सूर्योदय देखना एक बहुत ही सुखद अनुभव है। यह औली से ४० किमी की दूरी पर है.इसके अलावा बर्फ गिरना और रात में खुले आकाश को देखना मन को प्रसन्न कर देता है प्रकृति ने यहाँ चारो तरफ अपने सौन्दर्य को खुल कर बिखेरा है। बर्फ से ढकी चोटियों और ढलानों को देखकर मन बाग़-बाग़ हो जाता है। यहां पर कपास जैसी मुलायम बर्फ पड़ती है और पर्यटक खासकर बच्चे इस बर्फ में खूब खेलते हैं।
पहुंचने के साधन:
चूंकि औली को अभी तक रेल–मार्ग और वायु–मार्ग द्वारा सीधे नहीं जोड़ा गया गया है, अत: इन दोनों साधनों द्वारा यहां तक नहीं पहुंचा जा सकता। यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है। वहां से सड़क–मार्ग द्वारा (बस या टैक्सी से) औली पहुंचा जा सकता है। जबकि सबसे निकटतम एरपोर्ट देहरादून में है जो औली से २७९ किमी दूर है. टैक्सी और कैब देहरदुन एअरपोर्ट से हमेशा उपलब्ध रहती है वैसे, देश के हर प्रमुख शहर से ऋषिकेश सड़क–मार्ग द्वारा भी जुड़ा हुआ है। अत: बस या टैक्सी या कार द्वारा देश के किसी भी भाग से औली पहुंचा जा सकता है।
बेहतर समय:- हालाँकि गर्मी के दिनों में औली में काफी मजा आता है बरसात के मौसम में अनगिनत प्रकार के फूल–पौधे देखने को मिलते हैं, लेकिन इस स्थान की विशेषता और महत्ता को देखते हुए यहां दिसंबर के मध्य से अप्रैल तक की अवधि में आने पर यात्रा अधिक सार्थक होती है।
यहाँ ठहरने के लिए कहाँ रुके: औली में रूकने के लिए क्ल्फि टॉप रिसोर्ट सबसे अच्छा स्थान है। जहाँ से आप नंदा देवी, त्रिशूल, कमेत, माना पर्वत, दूनागिरी,बैठातोली और नीलकंठ के बहुत ही सुन्दर दृश्य का आनंद ले सकते है इसके आलावा गढ़वाल मंडल विकास निगम के द्वारा डीलक्स झोपड़ियों के साथ बंगले की वयवस्था की गयी है जहाँ एक दिन के करीब ७०० रूपये का शुल्क लगता है।
यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित...