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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

भाजपा और कांग्रेस एक ही हाइवे पर

अभी तक आपने सदन में चर्चा के दौरान सांसदों को एक दूसरे पर चिल्लाते, गुर्राते, हाथ लहराकर चुनौती देते और जबानी ल़ड़ाई में भि़ड़ते तो अक्सर देखा है, लेकिन कर्नाटक में देश के सबसे अनुशासित और चाल, चरित्र चेहरे वाली मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के सहकारिता मंत्री विधानसभा में कार्यवाही के दौरान मोबाइल पर अश्लील चित्र देखते हुए कैमरे में कैद हो गए इस घटना को मीडिया के द्वारा उजागर किये जाने के बाद भाजपा के शीर्ष अधिकारियों ने तीनो मंत्रियों से इस्तीफा तो ले लिया है लेकिन क्या इस्तीफा ले लेने से भाजपा के चेहरे पर लगे दाग धूल जायगा.?
दरसल केंद्र मे जो स्थिति कांग्रेस की है वही राज्यों के स्तर पर भाजपा की है दोनों पार्टियाँ चुनाव प्रचार के समय तो एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती है लेकिन दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार करने के मामले में एक-दूसरे को पीछे छोड़ रही है केंद्र में राज्य करने वाली कांग्रेस ने जहाँ २ जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेलों में लूट, आदर्श सोसायटी घोटाला, और इसरो जैसे घोटाले की लम्बी सूची को अपने खाते में सजा कर रखी वही भाजपा के सबसे चहेते मुख्य मंत्री वी एस यदुरप्पा और उतराखंड में रमेश पोखरियाल को भ्रष्टाचार के मामले में अपनी कुर्सी गवांनी पड़ीकर्नाट में अवैध खनन के घिनौने खेल में क्या बीजेपी और काँग्रेस सभी का चेहरा दागदार है. भ्रष्टाचार के मामले में मूख्य रूप से दोनों राष्ट्रीय पार्टियाँ एक हीं हाइवे पर अपनी गाडी को हांक रहें हैं

हाल में २ जी स्पेक्ट्रम के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आया उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियाँ प्रचार में अपने आप को हरिश्चंद्र बताने लगी. लेकिन ये कौन नहीं जानता की भ्रष्टाचार के नाम पर संसद से लेकर टी.वी पर जिस पार्टी के नेता सबसे ज्यादा अपने आपको हरिश्चंद्र बता रहे थे उसी पार्टी के मुखिया ने उत्तर प्रदेश में बाबु सिंह कुशवाहा को गले लगा कर भ्रष्टाचार की मुहीम पर ब्रेक लगा दिया.

भ्रष्टाचार इस देश को किस तरह घून की तरह खाये जा रहा है उसका सबसे बड़ा उदाहरण तो हमारे विधायक और सांसद हैंसभी जानते हैं कि उनको अपने कार्य के लिये कितना वेतन और भत्ता मिलता है ? परन्तु देखते ही देखते ही देखते उनके महल खड़े हो जाते हैं, करोड़ों की अचल सम्पत्ति बन जाती है और अच्छा-खासा बैंक बैलेंस जमा हो जाता है आश्चर्य की बात तो यह है कि लोग इस विषय में ऐसे बात करते हैं कि जैसे यह एक आम बात हो जिस जनता ने उनको चुनकर संसद या विधानसभा तक पहुँचाया है, वहां प्रश्न तक नहीं करती कि उनके पास इतना धन आया कहाँ से ? लोग यह भी नहीं सोचते कि जो पैसा आम जनता से कर के रूप में वसूला जाता है, देश के विकास के लिये, उसका न जाने कितना बड़ा हिस्सा तो इन लोक प्रतिनिधियों के जेब में चला जाता है.

भ्रष्टाचार के इस रोग के कारण हमारे देश का कितना नुकसान हो रहा है, इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है. पर इतना तो साफ़ दिखता है कि सरकार द्वारा चलाई गयी अनेक योजनाओं का लाभ लक्षित समूह तक नहीं पहुँच पाता है इसके लिये सरकारी मशीनरी के साथ ही साथ जनता भी दोषी है सूचना के अधिकार का कानून बनने के बाद कुछ संवेदनशील लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामने आये हैं, जिससे पहले से स्थिति सुधरी है. पर कितने प्रतिशत ? यह कहना मुश्किल है. जिस देश में लोगों द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही लोगों का पैसा खाने के लिये तैयार बैठे हों, वहाँ इससे अधिक सुधार कानून द्वारा नहीं हो सकता है

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

चुनाव में पर्यावरण बन पाएगा विकास का मुद्दा ?

पाँच राज्यों में हो रहे चुनावों में अलग-अलग राजनैतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में अपने कार्यक्रमों की घोषणा कर दी है। हमेशा की तरह वोटरों को सपने दिखाये जा रहे हैं। कोई विजन की बात कर रहा है तो कोई मन्दिर बनाने की, दिखाने को नारे, झण्डे और प्रतीक भले ही अलग-अलग हैं पर सब की कार्यशैली लगभग एक सी है। विकास के मुद्दे चुनाव प्रचार में छाए हुए हैं, शुद्ध पर्यावरण की बात कोई नहीं कर रहा है कहावत भी है 'जैसा खाए अन्न, वैसा होये मन' जैसा पीये पानी, वैसी बोले वाणी। ऐसे में आज प्रदूषित वातावरण में लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है पूरी दुनिया आज पर्यावरण के संकट से जूझ रही है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है हरित या साफ-सुथरी तकनीक का विकास और उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचलन। इस दिशा में भारत जैसे विकासशील देश भी अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते

दरअसल
, आज हमारी समूची राजनीति ही लोकविमुख और पथभ्रष्ट हो चुकी है। यही वजह है कि लोक से जुड़े पर्यावरण जैसे अहम मसलों को अकादमिक या बौद्धिक विमर्श का विषय मान लिया गया है
और न ही ऐसे मसलों को लेकर कोई राजनीतिक दल जनांदोलन छेड़ते हैं। विभिन्न राज्यों में हो रहे चुनाव को लेकर राजनितिक पार्टियाँ अपने घोषणा पत्र में वोटरों को लुभाने के लिए कई तरह के वादें कर रही है कोई २४ घंटे बिजली देने , तो कोई रोजगार के लिए कम्पनियों को लाने, आधुनिक शहर बनाने, पेरिस और लन्दन की तर्ज पर सड़के बनाने की बात कर रही है और इन सारी सुविधाओं के लिए जंगल से लेकर जंगली जानवर और पारम्परिक जल सोत्र सबको नष्ट करते जा रहें है.यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। शहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित वायु और ये दूषित हवा हमारे फेफड़ों में जाती है जिसके कारण दमा जैसी गंभीर सांस की बीमारी होती है कुछ ऐसे हीं श्वास के रोग और भी हैं जिनका इलाज़ संभव नहीं हैआज सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के जरूरी उपाय पर किसी राजनितिक पार्टी के पास कोई रणनीति नहीं है परिवहन व्यवस्था भ्रष्टाचार, अक्षमता, विलम्ब और अविश्वसनीयता की शिकार है। इसी कारण शहरों में बड़ी संख्या में लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं इन इलाकों में वाहनों से होने वाले प्रदुषण का स्तर भी हर समय काफी उंचा होता है

आज इतने सालों के बाद भी हमारे नेता साफ़ पानी तक उपलब्ध नहीं करा पाए देश में 75 प्रतिशत लोग अशुद्ध जल पीने को मजबूर है जो देश में व्याप्त अधिकतर महामारी की जड़ है छुआछूत की 20 प्रतिशत बिमारी दूषित पानी से हो रही है। 11 करोड़ घरों में एवं 30 प्रतिशत विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। कानूनी प्रतिबंध के बावजूद 1 लाख से अधिक लोग आज भी मैला उठाने का कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसे दूर करने के लिए इन नेताओं के पास कोई रणनीति नहीं है और यह चुनाव का मुद्दा भी नहीं बनता ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है

ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जता रहों हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नही पाता। ऐसे में हम खतरे को देखकर आंख बंद करने की गलती कर रहें है.
पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसकी अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते है। ऐसे समय में जब हम पानी को लेकर युद्ध की संभावना जाता रहे हो वहां पर यह मुद्दा विकास के साथ जुड़कर चुनावी चर्चा में स्थान नहीं पता.ऐसे में हम खतरे को देखकर आँख बंद करने की गलती कर रहे हैं. पर्यावरण हमारे भविष्य का आधार है और इसके अनदेखी के खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं
यह दैनिक 'नया इंडिया' में प्रकाशित...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

संकट में भारतीय पक्षी

मेरा बचपन गॉव में बिता है। मैं जुताई के खेतों में घंटों घुटनों तक गीली मिटटी में किसानो के साथ रहने का मजा भी उठाया है और डीजल इंजन के धक्-धक् करते सुरमय संगीत के बीच न कम होने वाली पानी की मोटी धार के बीच नहाने का मजा भी उठाया है। गर्मीं के दिनों में पक्के आम के लालच में एक बगीचे से दुसरे बगीचे चक्कर लगाना यह सोच कर आज भी मेरा मन रोमांच से भर उठता है। दो मंजिले छत पर धुप में बैठ कर खाना खाने का मजा ही कुछ और था, कई बार तो खाने की प्लेट से कौए रोटी लेकर भाग जाते और थोड़ी ही दूरी पर इठलाती और चिढाती हुई खाती. एक लम्बे अरसे के बाद जब घर आया हूँ, तो वो चहकती-फुदकती हर जगह दिखाई देने वाली, हमारे घर आगन में फुदकती प्यारी सी और कोमल सी चिड़ियाँ कहीं नहीं दिख रही है। शैशवावस्था से इनको आकाश में उड़ते देखने के कारण जो प्रेरणा मिलती रही है, उसी का परिणाम है कि हर किसी को उड़ने की इच्छा होती है। कौए, गौरैए, मैना, तोता जैसे पक्षी का पारिवारिक माहौल में घुलने-मिलने के बाद इनकी संख्या का कम होना अखरने लगा है। वर्षों पहले तो इन पक्षियों का झुण्ड हमारे घरों ,सार्वजनिक स्थ्लों, चौक, चबूतरों, खिडकियों यहाँ तक की कमरों के अन्दर भी देखे जा सकते थे। उसका फुदकना और चहचहाना हर किसी का मन मोह लेता है। हमारे बचपन की बहुत सी यादें इन नन्ही सी चिड़ियों के अठखेलियों से जुडी हुई है। लेकिन आज इसकी संख्या बहुत तेजी से कम होते जा रही है और इसके विलुप्त होने का खतरा मडरा रहा है। शहरीकरण से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और पक्षियों के घोंसलों के लिए पेड़ भी नहीं बच रहे हैं। इसके अलावा मकानों में बिजली, केबल आदि के तारों का इस तरह जाल बिछा है कि गौरैया जैसे पक्षियों के लिए उड़ना मुश्किल होता जा रहा है। आधुनिक युग में रहन-सहन और वातावरण में आ रहे बदलावों के कारण गौरैया पर कई ख़तरे मंडरा रहे हैं। सबसे प्रमुख ख़तरा उसके आवास स्थलों का उजड़ना है। आज हमारे घरों में आंगन होते ही कहां हैं, फिर बेचारी गौरैया घोंसला बनाए कहां? आधुनिक युग में पक्के मकानों की बढ़ती संख्या एवं लुप्त होते बाग़-बग़ीचे भी उसके आवास स्थल को छीन रहे हैं। इसके अलावा भोजन की कमी भी गौरैया के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है। भारत के आलावा और कई देशों में पायी जाने वाली इन पक्षियों की संख्या कम होती जा रही है। इसके आलावा भी अन्य भारतीय पक्षी जैसे गिद्ध जो पर्यावरण का सबसे बड़ा हितैषी और कुदरती सफाईकर्मी के रूप में जाना जाता है जो धरती पर पड़े लावारिश पशु-पक्षियों के शवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। इतना ही नहीं, ये गिद्ध शाकाहारी भोजन का कचरा भी मज़े से खा लेते हैं। लेकिन अब गिद्ध प्रजाति संकट में हैं। शहरों में तथा बड़ी आबादी वाले गांव में तो गिद्ध के दर्शन भी दुर्लभ हो चुके हैं। इस समय देश में गिद्धों की नौ प्रजातियों की जानकारी है। जिनमें से अधिकांश उत्तराखंड में मिलती है। हिमालयन ग्रिफन, व्हाईट वेक्ड, सिलेन्डर बिल्ड, रैड हैडेड, इजिप्सियन, सिनेरियस, ला मरगियर और लौंग बिल्ड प्रमुख है। इनमें से लौंग बिल्ड और सिलेन्डर बिल्ड प्रजाति समाप्त होने के कगार पर है। एक अनुमान के मुताबिक अस्सी के दशक में देश में आठ करोड गिद्व थे। लेकिन अब इनकी सख्या बमुशिकल कुछ हजार ही रह गई है। विलुप्त हो रहे इन गिद्धों को बचाने के लिए सरकार देश में तीन गिद्ध संरक्षण प्रजनन केन्द्र चला रही है। जो पिंजौर (हरियाणा), राजाभातखावा (पश्चिम बंगाल) व रानी (असम) में स्थापित हैं। मगर ये सभी योजनाएं गिद्धों को बचाने में नाकाफी साबित हो रही हैं। जंगल के इस सफाईकर्मी की घटती संख्या से वन्य जीवों समेत मानव की जान पर खतरा मंडराने लगा है। जिससे वाइल्ड लाइफ प्रेमी काफी चिंतित हैं। देश के शहरी व ग्रामीण इलाकों में अगर गिद्धों की चहल-पहल देखनी है तो इनके संरक्षण के लिए हमें आगे आना होगा। नही तो मानव का सच्चा हितैषी विलुप्त हो जाएगा और हमें तरह-तरह की भयंकर बीमारियों से दो चार होना पड़ेगा। जिसके लिए हम खुद जिम्मेदार होंगें।