Free Random Funny Pictures for Your Web Site

सोमवार, 30 अगस्त 2010

interview of anusha rizvi director peepli live - ‘पीपली लाइव’ मेरी और महमूद दोनों की फिल्म है: अनुषा - HindiLok.com

interview of anusha rizvi director peepli live - ‘पीपली लाइव’ मेरी और महमूद दोनों की फिल्म है: अनुषा - HindiLok.com

asgar wajahat, drama, painter - मैं भटकती आत्मा हूं: डॉ. असगर वजाहत - HindiLok.com

asgar wajahat, drama, painter - मैं भटकती आत्मा हूं: डॉ. असगर वजाहत - HindiLok.com

azad encounter - आजाद के एनकाउंटर का बड़ा सवाल - HindiLok.com

azad encounter - आजाद के एनकाउंटर का बड़ा सवाल - HindiLok.com

azad encounter - आजाद के एनकाउंटर का बड़ा सवाल - HindiLok.com

azad encounter - आजाद के एनकाउंटर का बड़ा सवाल - HindiLok.com

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

Suno! Naraz na ho humse,


Suno! Naraz na ho humse Suno na yun door n jao mujhse.. hum Khud wo hain Jin ko, manana bhi nahi aata, DOSTI kis tarha hoti hai, Yeh jatana bhi nahin aata hume,

Suno! Naraz na ho humse, Na koi Phool tum jaisa ki mehak uthe humare deed-e-dil Jis ki Khushbo se, Patjhar ka wo mausam tal chuka hai... ab to magar jo haar honi thi, wo to ho chuki hum se

Suno !Haare hue logon sey yon rootha nahi karte, Suno! Is kadar naraz na ho humse……. ..!!!!

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

आजादी के मायने

दुनिया का एक सर्वोच्च गणराज्य है उसके हम आजाद बाशिंदे हैं पर क्या वाकई हम आजाद हैं? रीति रिवाजों के नाम पर कुरीतियों को ढोते हैं , धर्म ,आस्था की आड़ में साम्प्रदायिकता के बीज बोते हैं। कभी तोड़ते हैं मंदिर मस्जिद कभी जातिवाद पर दंगे करते हैं। क्योंकि हम आजाद हैं.... कन्या के पैदा होने पर जहाँ माँ का मुहँ लटक जाता है उसके विवाह की शुभ बेला पर बूढा बाप बेचारा बिक जाता है बेटा चाहे जैसा भी हो घर हमारा आबाद है हाँ हम आजाद हैं। घर से निकलती है बेटी तो दिल माँ का धड़कने लगता है जब तक न लौटे काम से साजन दिल प्रिया का बोझिल रहता है अपने ही घर में हर तरफ़ भय की जंजीरों का जंजाल हैं हाँ हम आजाद हैं। संसद में बैठे कर्णधार जूते चप्पल की वर्षा करते हैं। और घर में बैठकर हम देश की व्यवस्था पर चर्चा करते हैं हमारी स्वतंत्रता का क्या ये कोई अनोखा सा अंदाज है? क्या हम आजाद हैं?......
21वीं सदी तक आते-आते हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस के मायने बहुत कुछ बदल गए हैं। एक तरफ 'इंडिया' के भीतर 'नया अमेरिका' तेजी से विकसित हो रहा है, तो दूसरी तरफ असली भारत आज भी बदहाल और भूखा है। हमारे लिए स्वतंत्रता के मायने बस इतने ही हैं कि हम आजाद हैं। इस एक दिन की आजादी को हम किन्हीं सांस्कृतिक समारोहों में शरीक होकर बस निपटा लेते हैं। थोड़ी देश और समाज की वर्तमान हालत पर चिंता व्यक्त कर लेते हैं। कुछ आमंत्रित गरीबों को कुछ पैसा या सम्मान देकर इंसानियत के भ्रम में कुछ क्षण जी लेते हैं। बहुत जरूरी हुआ तो देश के शहीदों को याद इसलिए कर लेते हैं ताकि उनका कर्ज उतार सकें। कुछ समझदारों ने इधर एक नई परंपरा ही विकसित कर डाली है, वे रात में शहीदों के नाम पर आतिशबाजी को अंजाम देते हैं। तो कुछ हाथों में मोमबत्तियां थामें जाने क्या संदेश देना चाहते हैं। स्वतंत्रता दिवस को महज जश्न के रूप में निपटा देते हैं।एक लंबे समय से यह सवाल मेरा पीछा कर रहा है कि हम कहां, कितने और कैसे आजाद हैं? हममें से कुछ ने तो अपनी-अपनी आजादियों को ही देश, समाज और जन की आजादी मान लिया है। हम अपनी जिंदगी को स्वतंत्रता के साथ जी लेते हैं, तो सोच-समझ लेते हैं कि सारा भारत ऐसे ही जी-रह रहा होगा। यह विडंबना ही है कि कोई भी अपनी स्वतंत्रता को किसी दूसरे के साथ साझा नहीं करना चाहता। जैसे स्वतंत्रता उसकी बपौती हो। विभिन्न खांचों में ढली-बंधी यह स्वतंत्रता मुझे अक्सर आतंकित करती है।वर्ग और जाति की संकीर्ण अवधारणाएं आज भी हम पर वैसे ही हावी हैं, जैसे सदियों पहले हुआ करती थीं। आज भी समाज में इंसान की पहचान इंसानियत से नहीं उसकी जाति और उसके वर्ग से तय होती है। वर्ग और जातियों में विभक्त हमारा समाज इनसे मुक्त होने का माआदा कभी दिखाता ही नहीं। आज भी गांव-कस्बों में पंचायतें किसी के जीने न जीने के अधिकार को छिनने की ताकत रखती हैं। वर्ग और जाति के इस दंभ को अक्सर हम अपनों के ही बीच देख-सुन सकते हैं। कुछ धर्म ने, तो कुछ धार्मिक अंधभक्तों ने ऐसे जटिल नियम-कानून बना दिए हैं, जिसका पालन हमें किसी की भी स्वतंत्रता को लांघकर करना पड़े, तो करेंगे। क्योंकि यह धर्मसम्मत है।बेशक स्वतंत्रता और लोकतंत्र बहुत ही मोहक शब्द हैं। पर इन शब्दों की मोहकता पर ग्रहण इसलिए लगता रहता है क्योंकि हमने इन्हें सिर्फ खुद के लिए ही संरक्षित कर लिया है। यानी मेरी स्वतंत्रता। मेरा लोकतंत्र। असहमत या क्रोधित होकर किसी को मार डालने का पाप अब हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र में शामिल हो गया है। अपना मकसद हल करने के लिए किसी दूसरे की स्वतंत्रता या लोकतंत्र को छिनने पर अब हमें अफसोस नहीं होता।इस 63 साल की स्वतंत्रता का सुफल बस इतना ही है कि हम अब अपनों के ही गुलाम बना लिए गए हैं। जो अर्थ और बल संपन्न है, वो हमारा अन्नदाता है। वो अपने और हमारे बीच गहरे भेद को लेकर चलता है। वो इसी भेद को अपनी स्वतंत्रता और लोकतंत्र मानता है, ताकि हमारी गुलामी पर वो राज कर सके। कमाल देखिए, यहां तो जनता जिसे अपना वोट देकर चुनती है, वो भी कुर्सी पाते ही बदल जाता है। भले ही यहां जनता को वोट का अधिकार हो परंतु राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकार उसके पास नहीं है। राजनीति में जनता और नेता के बीच बहुत दूरियां हैं। जनता उनकी गुलाम है इसका एहसास हमारे नेता उसे हर दम कराते रहते हैं। और यही नेता स्वतंत्रता दिवस पर जनता पर यूं न्यौछावर हो जाते हैं जैसे उन्होंने अपना हर अधिकार जनता को दे रखा है।इस कथित खुशहाल और स्वतंत्र भारत में मुद्रास्फति की दर पर तो चिंता जताई जाती है लेकिन सूखे की मार से आत्महत्या कर रहे किसान किसी सरकार या बुद्धिजीवि की चिंता का विषय नहीं बन पाते। सिमटते गांव और बंजर होते खेत पर आजाद भारत में कोई आंसू नहीं बहाता। आज हर कोई कैसे भी इंडिया को स्माल अमेरिका बना देना चाहता है। चमकते-दमकते इंडिया में भूखे-नंगे भारत का क्या काम?आखिर हम भारत की किस आजादी पर प्रसन्न होएं? कैसे कहें कि हम एक आजाद लोकतांत्रिक मुल्क हैं? यहां न कोई छोटा है न बड़ा। न अमीर है न गरीब। न वर्ग है न जाति। न अपराध है न नौकरशाही। बताएं क्या कह सकते हैं हम यह सब? हम तो अपने ही हाथों अपने देश को तोड़ने पर तुले हैं।किस मुश्किल से हमने इस आजादी को पाया है उस दर्द को हम इसलिए भी महसूस नहीं कर सकते क्योंकि हम उस दौर और पीड़ा से गुजरे ही नहीं हैं। मगर इसका यह मतलब तो नहीं कि हम देश और जन की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की ताकत को अपने हिसाब से इस्तेमाल करें। यह देश, यह स्वतंत्रता, यह लोकतंत्र किसी एक का नहीं हम सबका है। फिर क्यों नहीं हम इस सम्मान को सबके लिए बनाकर रख सकते।'हम आजाद' हैं कि भावना को जब तक हम हर भारतवासी के जहन में महसूस नहीं करते, तब तक इस आजादी का हमारे लिए कोई मतलब नहीं रह जाता।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

अमीर बढ़ रहे हैं या अमीरी!


एक अमीर आदमी का बेटा बिगड़ रहा था। उसे पटरी पर लाने के लिए रईस पिता ने अपने एक मुलाजिम से कहा कि इसे अपने गांव ले जाओ, वहां की दुश्वारियां देखेगा तो दिमाग दुरुस्त हो जाएगा। बेटा अपने ही नौकर के गांव में एक महीने रहकर लौटा तो रईस पिता ने पूछा कि तुम्हारा अनुभव कैसा रहा?बेटे का जवाब था कि हमारे पास एक कुत्ता है, उनके पास दो हैं। हम खिड़की बंद करके सोते हैं और बिजली चले जाने पर जब एसी बंद हो जाता है तो उसे खोलने से डरते हैं। वहां हर समय ठंडी हवा आती है। यहां हम नहाने के लिए स्विमिंग पूल बनाते हैं, उनके पास झरने और नदियां हैं। हमें घूमने या दौड़ने के लिए पार्क की जरूरत पड़ती है, जबकि वहां कुटिया से बाहर कदम रखते ही प्रकृति अपनी गोद में ले लेती है। शहर में हंसने के लिए टीवी या सिनेमा का सहारा लेना पड़ता है, वहां लोग यूं ही ठहाके लगाते रहते हैं। यह किस्सा बयान कर देने के बाद बेटे ने पूछा कि अब आप ही बताइए कि कौन गरीब है?
पंचतंत्र की कहानियों की तर्ज पर गढ़ी गई यह कारपोरेटी कथा अमीरों को भले ही कोई सीख देती हो पर गरीबों के बारे में सिर्फ एक फंतासी पेश करती है। अफसोस, इस समय भारत में जिस तेजी से अमीर बढ़ रहे हैं, उससे कई गुना गति से गरीब और गरीबी बढ़ रही है।
इससे भी बड़ा खेदजनक तथ्य तो यह है कि हिन्दुस्तान में गरीब और गरीबी के आंकड़े एक-दूसरे को झुठलाते हैं। आंकड़ों की यह बाजीगरी हुक्मरानों के हित साधती है, क्योंकि शासकों की मेहरबानी पर टिके संयुक्त राष्ट्र संघ या भारी भरकम बजट वाली अकादमियों में बैठे लोग निर्धनता मापने के मानदंड गढ़ते हैं। इनमें विरोधाभास होना लाजिमी है।
ऑक्सफोर्ड पावर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से इधर जो बहुआयामी निर्धनता सूचकांक तैयार किया है, उसको लेकर बुद्धिजीवियों में बहस बड़ी गरम है। इस सूचकांक के अनुसार सिर्फ बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बंगाल में 42 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी में जिंदगी गुजार रहे हैं।
खुद को संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर अपना मान बढ़ाने वाले लोग इस तथ्य को जानकर सकते में आ सकते 20अफ्रीकी देशों में इससे कम निर्धन वास करते हैं।

एक सर्वे में यह भी पाया गया कि भारत लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन देने के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। इस लिहाज से यहां के 55 प्रतिशत लोग गरीब हैं। कमाल तो यह है कि अब तक भारत में गरीब या गरीबी का कोई विवाद रहित आकलन नहीं हो सका है।
मसलन, पांच साल पहले विश्व बैंक ने भारत में गरीबों की संख्या 44 फीसदी आंकी थी जबकि भारतीय योजना आयोग की नजर में कुल 25.7 प्रतिशत लोग गरीब थे। तीन साल बाद अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी ने पाया कि सिर्फ 33 प्रतिशत लोग सामान्य जीवन जी रहे हैं जबकि अगले साल एनसी सक्सेना समिति को आधे लोग विपन्न नजर आए।
इन सबसे अलग योजना आयोग की ही तेंदुलकर समिति ने इस साल देश में 37.2 प्रतिशत लोगों को वंचितों की श्रेणी में रखा। आप इन आंकड़ों के वैषम्य को देखकर ही समझ सकते हैं कि ये जरूरतमंदों का क्या भला करेंगे? जिन लोगों पर गरीबी दूर करने की जिम्मेदारी है, वे ही जब मर्ज का आकलन ही नहीं कर पाएंगे तो भला उसका इलाज क्या करेंगे? यही वजह है कि अब तक मरीजों का इलाज होता रहा है, मर्ज का नहीं।
हुक्मरां भी इस नेक काम के नाम पर सिर्फ नारे गढ़ते रहे हैं। कोई कहता है कि हर हाथ को काम और हर खेत को पानी दिलाकर छोड़ेंगे। किसी ने गरीबी हटाने की बात कही। खुद को वंचितों का मसीहा बताने वाले वामपंथी तीन दशक से पश्चिम बंगाल पर हुकूमत कर रहे हैं, उन्होंने भी गरीबों का कोई भला नहीं किया। बंगाल आज भी देश के सबसे साधनविहीन लोगों का समूह बना हुआ है।
मतलब साफ है कि गरीबी हटाने में किसी की रुचि नहीं है। यही वजह है कि लोग अकसर मजाक में कहते हैं कि हिन्दुस्तान अमीर है लेकिन हिन्दुस्तानी गरीब। कुछ आंकड़े इस उपहास को बल देते हैं। हिन्दुस्तान में गरीब कितने हैं, यह तो नहीं मालूम पर अमीरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दिसंबर 2007 में हिन्दुस्तान में कुल 21 अरबपति हुआ करते थे। तीन साल में इनकी संख्या बढ़कर 331 हो चुकी है।
खुद हमारी संसद और विधानमंडलों में करोड़पतियों की गिनती में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी होती जा रही है। लोकसभा में इस समय 300 सदस्य करोड़पति हैं। आपको यह तो मालूम ही होगा कि भारतीय जनता के लोकतांत्रिक अरमानों के इस प्रतिनिधि सदन में 545 सदस्य होते हैं।
इसे दुर्भाग्य ही तो कहेंगे कि एक गरीब देश में अमीर जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ती जा रही है। वंचितों की गिनती को लेकर मतभेद हैं, पर अमीरों की गिनती पर कोई सवाल नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि अमीरों की तादाद में बढ़ोतरी कोई बुरी बात नहीं है, यह नौजवान देश की उम्मीदों और जोश का प्रतीक है।
अगर आज अमीर बढ़ रहे हैं और उनके साथ मध्य वर्ग पनप रहा है तो कल गरीबी जरूर कम होगी। वे सही हो सकते हैं। पर गरीबी हटाओ को नारे से हकीकत में तब्दील करने के लिए जिस तेजी और तत्परता की जरूरत थी, उसका अभाव बरस दर बरस महसूस किया गया है।
तो क्या शासकों की सोच बदलेगी? उम्मीद की रोशनी जलाए रखने में हर्ज ही क्या है?

कहावतो में सिमटा मौसम विज्ञान

आज हम आधुनिक यंत्रों के ज़रिए भविष्य के मौसम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं....लेकिन सदियों पहले ही मारवाड़ के लोगों ने मौसम विज्ञान का सार तुकबंदियों और कहावतों में पिरो दिया ... बड़े बुर्जुगों से कई कहावतें आपने भी सुनी होगी, इन्हे परखने पर पता चलता है....कि यह संक्षेप में सार बयां करने का बरसों पुराना अंदाज था...लेकिन क्या आप जानते है कि मौसम कि भविष्यवाणी करने वाली भी लोक कहावतें हैं....
राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन कहावतों पर भरोसा करते है..यहाँ के लोगों ने अपना विज्ञान लोक कहावतों और तुकबंदियो के बलबूते विकसित किया है...आज भले ही आधुनिक मशीनी यंत्रो से मौसम वर्षा, आंधी, तूफान की अग्रिम जानकारी मिल जाती है..लेकिन मारवाड़ के ग्रामीण जन आज भी इन कहावतों पर विश्वास करते हैं....यह कहावतें और भविष्य और इनके आधार पर की गई भविष्यवाणियां ज्यादातर सटीक और सही भी होती है.....तभी तो इन लोगों का विश्वास इतना पक्का हो गया है ....
कुछ कहावतें हैं जो दिन के हिसाब से मौसम का हाल बंया करती है.....जैसे
सुकरवार री बदरी, रही शनीसर छाए। डंक कहे है भडड्ली, बरस्या बिन न जाए ।
इस कहावत के अनुसार डंक भडड्ली से कहता है- य़दि शुक्रवार को बादल आए और शनिवार तक रहें, तो समझ जाओ कि बादल बरसे बिना नहीं जाएंगे, यानी ऐसे संकेत मिलने पर बारिश का होना तय समझा जाता है.........
माह मंगल, जेठ रबी, भारदेव सन होय। डंक कहे है भडड्ली, बिरला जिवै कोय।
इसमें बताया गया है कि माघ माह में यदि पांच मंगलवार हों, जेठ माह मे पांच रविवार औऱ भादों में पांच शनिवार हो, तो डंक भडड्ली से कहता है भविष्य में ऐसा अकाल पड़ेगा, जिसके बाद शायद ही कोई जीवित बचे...इनके अलावा कुछ ऐसी कहावतें हैं जो हवा के रुख़ को भांपकर बारिश या अकाल पड़ने की सम्भावना की बात कहती है...
नाडा टाकंण बलद विकावण। मत बाजे तू, आधे सावण।
जब आधे सावन में दक्षिण पूर्व की हवा चलती है, तो मारवाड़ का किसान कहता है, हे भगवान ऐसी हवा मत चल, जिससे अकाल आने की सूचना मिलती है। जिसके कारण किसान को अपना बैल बेचना पड़ जाता है....
पवन बाजे सूरयो,तो हाली, हलाव कीम पुरयो
यदि उतर-पश्चिम कोण की ओर से हवा चले, तो किसान को नई ज़मीन पर हल नहीं चलना चाहिए, क्योंकि मेघ जल्दी आने वाला है.....इसी तरह मारवाड़ के किसान सूर्य और चंद्रमा के उदय होने के स्थान पर भी निर्भर रहता है.....
इन कहावतों के आधार पर मौसम का अंदाजा लगाने का क्रम बरसों से चल रहा है और शायद आगे भी सदियों तक चलता रहेगा...मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यंत्रो के आने से बहुत पहले ही इस गांव के बुजुर्गों ने कहावतों में मौसम का भविष्य गढ़ दिया है। जिनकी सटीकता और प्रमाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता ...सच, अद्भुत है हमारा देश।