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शनिवार, 13 अगस्त 2011

वर्तमान सत्ता के मायने

यूपीए- दो सरकार आर्थिक नवउदारवाद के एजेंडे को बेशर्मी के साथ आगे बढ़ा रही है, इस कारण जनता की तकलीफें-परेशानियां कई गुना बढ़ गई है। मुद्रास्फीति, नये साल के शुरुआत में 12-13% की दर से बढ़ रही है। वह सभी आवश्यक वस्तुओं, अनाज सब्जियों, खाद्यानों के मूल्यों में वृद्धि और पिछले जून में ईंधन के मूल्यों के डीरेगुलेशन के बाद से पेट्रोल के दाम में बार-बार की वृद्धि बढ़ती ही जा रही है। पेट्रोल के दाम में वृद्धि से हमेशा ही तमाम वस्तुओं के मूल्यों में सामान्यत: वृद्धि हो ही जाती है इसी कारण एक स्टेज पर प्याज 70-80 रुपये और फल, दूध, सब्जी सभी के दाम आसमान छुने लगे।

बेरोजगारी और रोजगार के अवसर में कमी हर गुजरते दिन के साथ बढ़ते जा रही है। वर्तमान सरकार खुद मानती है कि बेरोजगारी दर 9.4 प्रतिशत है यानी 2.8 प्रतिशत की अनुमानित दर से तीन गुना अधिक। अधिकांश संगठित उद्दोगों मे स्थायी कामों को ठेका मजदूरों और कैजुल मजदूरों से कराने का व्यापक पैमाने पर अपना लिया गया है। आर्थिक असमानता अर्थात् अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ रहा है एक तरफ विश्व के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में भारतियों की संख्या दो अंको में है तो गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अपनी उपलब्धियां दिखाने के लिए सरकार बीपीएल के मानदंडों में हेर-फेर कर रही है जबकि कड़वा सच यह है कि देश के लोग महंगाई, बेरोजगारी, वास्तविक मजदूरी में कमी और अन्य आर्थिक तकलीफों के बोझ तले कराह रहे हैं। योजना अयोग ने बीपीएल के नये मानदंड के लिए सुझाव दिया था जो व्यक्ति शहरी इलाकों मे 20 रुपये और ग्रामिण इलाकों में 15 रुपये रोजाना खर्च करने मे असमर्थ हैं वही बीपीएल में आने चाहियें। यह गरीबों को भुखमरी लाइन पर धकेलने के अलावा और कुछ नहीं है।

वर्तमान समय में जिस चीज नें आम लोगों का ध्यान सबसे ज्यादा आकर्षित किया है वह है काला धन और भ्रष्टाचार। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने जनता का ध्यान इन मुद्दों पर फोकस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। ऐसे में घपलों और घोटालों जिनमें इतनी बड़ी घोटाला है कि देखकर दिमाग चकराने लगता है। मीडिया ने इन घोटालों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट, आदर्श सोसायटी घोटाला, इन्कम टैक्स प्राधिकरण द्वारा यह पुष्टि कि गांधी परिवार के सबसे करीबी क्वात्रओची और विन चड्ढा को बोफोर्स से कमीशन मिला था, इसरो(भारतीय अंतरीक्ष अनुसंधान संगठन जो सिधे प्रधानमंत्री के तहत आता है) द्वारा देवास मल्टी मीडिया को वाणिज्यिक उपयोग के लिए एस-बैंड स्पेक्ट्रम का दिया जाना, घोटालों और घपलों की ये चंद उदाहरण है। इन घोटालों के पर्दाफाश के कारण पहले ही केन्द्र सरकार के तीन मंत्री (शशि थरुर और ए राजा, दयानिधि मारन), और एक मुख्यमंत्री अशोक चव्हान सरकार से बाहर हो चुके हैं दूसरी तरफ भाजपा को भ्रष्टाचार के आरोप में कर्नाटक के मुख्यमंत्री और पंजाब में दो मंत्रियों को हटाना पड़ा।

जहां तक काले धन का संबंध है, यह भी एक पूंजीवादी समाज के लिए अपरिहार्य है इस पैसे को बिजनेस के लोग, शासक राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह हमेशा ही विदेशी बैंकों में जमा कराने के तरीके पर चलते आये हैं। हवाला कारोबार विश्व भर के तमाम टैक्स हेवन देशों से कालेधन को इधर से उधर ले जाने का काम करने के आधार पर ही फलता-फुलता है। एक अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के अनुसार 1948 से 2008 के बीच, 900,000 करोड़ रुपये से अधिक धन भारत से बाहर गया है और स्विस बैंकों एवं अन्य समुद्र पार टैक्स हेवन देशों में जमा किया गया है। जर्मनी के एक बैंक ने वहां कालेधन का खाता रखनेवाले भारत के लोगों की सूची सरकार को दी है, पर वर्तमान सरकार उनके नाम जाहिर करने से इंनकार कर रही है। इसके अलावा, देश के अंदर काले धन की एक समानान्तर अर्थव्यवस्था है, और अनुमान है कि वह वास्तविक अर्थव्यवस्था से काफी बड़ी है।

मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और काले धन- ये तमाम बातें व्यवस्था की विफलता, सरकार की दिवालियापन को व्यक्त करती है। किसी भी सरकार की विदेश नीति उसकी आंतरिक नीतियों का, खासकर आर्थिक नीतियों का विस्तार होती है, अत: अमरीकी साम्राज्यवादियों की जोड़-तोड़ के सामने अधिकाअधिक आत्मसमर्पण किया जा रहा है। ब्रिक्स और जी-20 के मंच पर हमारी सकारात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद, आर्थिक मोर्चे पर हम पश्चिम देशों की जोड़तोड़ एवं तिकड़मबाजी के सामने पहले ही लगभग आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शंघाई सहयोग परिषद में शामिल होने का भारत का फैसला स्वागत योग्य है क्योंकि यह हमें साम्राज्यवादी दवाबों का काउंटर करने में मदद कर सकता है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी हम अमरीका की ओर मार्ग दर्शन के लिए देख रहे है। ईरान से संबंधित अनेक मामलों में हम अमरीका निर्दिष्ट लाइन पर दस्तखत करते रहे हैं। यहां तक की हम लीबिया पर बमबारी करने की इजाजत देने वाले अमरीका-ब्रिटेन प्रायोजित प्रस्ताव का विरोध करने में भी विफल रहे।

आर्थिक एवं विदेशी नीतियों में जारी दक्षीणपंथी एवं अमरीका परस्त शिफ्ट को गंभिरता से लेने की जरुरत है और हमारी आर्थिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए इस बढ़ते खतरे के विरुद्ध जनता को जागरुक किया जाना चाहिए।

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