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बुधवार, 7 सितंबर 2011

जनभावना की जीत

सामाजीक कार्यकर्त्ता अन्ना हजारे के द्वरा भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में आखिरकार संसद भी बधाई की पात्र बनी । जनभावना को सम्मान देते हुए सभी राजनीतिक दलों के सासंदो ने जनलोक पाल विषय पर चर्चा के साथ-साथ अण्णा से अनश्न समाप्त करने की गुहार लगाई। सरकार ने भी अपने रुख में नरमी दिखाते हुए अण्णा के तीन मांगो को संसद में सर्वसम्मति से स्विकार कर लिया। जनलोकपाल के तीनों मांगो पर चर्चा का आरंम्भ विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज ने अपने मंझे अंदाज मे शुरु की और सरकार के तरफ से संदीप दीक्षित ने जजों को छोड़कर लोकपाल विधेयक के प्रावधानों के प्रति अपनी सहमति रखी । इसे देखकर तो ऐसा लगने लगा था की संसद जनलोकपाल और अण्णा के स्वास्थ्य को लेकर काफी संजीदा है लेकिन बहस जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया उसमें हल्कापन आता गया। इस पूरे बहस के दैरान यह देखने को मिला की सांसद कितने अनुशासित, धैर्यवान और समझदार हैं। इन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी कि उनकी ये हरकतें देशवासी भी देख रहें है। बार-बार सभापति द्वारा निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के संकेत दिए जाने के बावजूद सदस्य जिस तरह से उनके निर्देशों को अनसुना कर रहे थे, वह देश की सर्वोच्चय संस्था संसद की गरिमा के विपरीत था।

रामलीला मैदान के मंच से अभिनेता ओमपुरी ने सांसदो पर जिस तरह की टिप्पणी की उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। हलांकि इस पर बाद में वे माफी भी मांग लिए थे। लेकिन इस अभद्रता पर जो सांसद संसद में सबसे ज्यादा बोल रहे थे वे खुद देश के प्रथम व्यक्ति महामहिम राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सफेद हाथी तक कह डाला। क्या इसके लिए इन्हें माफी नहीं मांगनी चाहिए? यह सिलसिला यहीं तक नहीं थमा पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने जिस तरह से अण्णा के अनशन पर चुटकी लेते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई अससे इन लोगों की संसद और मुद्दों के प्रति निष्ठा और गहराई मापी जा सकती है।

बहराल राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर सांसदों की बहस कितनी कारगर रही वो तो आने वाले विधान सभा चुनाव में ही पता चल पाएगा। सरकार बड़ी चतुराई से अण्णा के तीनों मांगो पर हामी भर कर आंदोलन का पटापेक्ष तो कर दिया है लेकिन जनलोकपाल पर सरकार की क्या रुख होती है यह तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगा।

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