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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

घाना में कलरव करते सायबेरियन पक्षी

कहा जाता है की प्रकृति माँ सबसे सुन्दर होती है और मै वही सुन्दरता को अपनी आँखों से देखने की चाहत में भरतपुर उद्यान जा पहुंचे प्रकृति के नज़ारे को करीब से देखने के लिए हम सब हमेशा लालायित रहते है, लेकिन इस नज़ारे को देखने के लिए समय निकालना आसान नहीं होता। कभी प्रकृति को देखने का मौसम नहीं है, तो कभी समय का अभाव। अगर आप भी बाघों और अपनी दुनिया में मस्ती करते अन्य जंगली जीव-जंतुओं को देखना चाहते हैं तो भरतपुर पक्षी अभयारण्य आपके लिए अच्छी जगह हो सकता है। केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान में प्रकृति और मानव इतिहास का नाता करीब 250 वर्ष पुराना है। सन् 1745 में गंभीर और बाणगंगा नदी के मिलन स्थान पर बनी छिछली जगह में भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने बारिश के मौसम में बरसने वाले पानी पर अजान बांध बनवाया और प्राक्रतिक गहराई में पानी भरने से यह स्थान विकसित हुआ। यहां पर बाढ़ के कारण छिछला आर्द्र पारिस्थितिकीय तंत्र बना, जो विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों के लिए एक बेहतर निवास स्थान बन गया। नमभूमि वाला यह क्षेत्र रामसर स्थली भी है और इसे प्राकृतिक विश्व धरोहर भी घोषित किया गया है। भरतपुर शहर से दो किलोमीटर दूरी पर घाना पक्षी अभयारण्य पहले भरतपुर राजपरिवार की शिकारगाह हुआ करता था। इस स्थान को सन् 1956 में पक्षी अभयारण्य और सन् 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया, जबकि 1985 में इसे विश्व विरासत का दर्जा मिला। यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल सूची में शामिल केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान पक्षी संसार का स्वर्ग है तो पक्षी प्रेमियों का तीर्थ। पक्षियों की दुनियाँ भी वड़ी विचित्र होती है।
यह प्रकृति पदत्त सबसे सुन्दर जीवों की श्रेणी में आते हैं। इनसे मानव के साथ रिश्तों की जानकारी के उल्लेख प्राचीनतम ग्रंथों में भी मिलते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान में सुंदर पक्षियों के 375 से अधिक प्रजातियों का बसेरा है। इनमें से 132 से अधिक यहीं पर अपने परिवार को बढ़ाते हैं। यहां केवल देश से, बल्कि यूरोप, साइबेरिया, चीन और तिब्बत से भी पक्षी आते हैं। मानसून में यहां साइबेरियाई बार हेडेडगूंज, कोमन क्रेन, चीन का चायनाकूट, साइबेरियाई पिंकटेल, मंगोलियाई सोबलर, पेलिकन, श्रीलंकाई ब्लेकनेक स्टॉर्क सहित सांभर को भी देखा जा सकता है। पक्षियों की प्रवास यात्राएं सबसे लंबी, चुनौती भरी और विलक्षण होती है। इन पक्षियों के प्रवास-यात्राओं पर जाने के अनेक कारण हैं, जिनमें से मुख्य हैं मौसम में असहनीय परिवर्तन और भोजन की कमी। प्रकृति की अनुपम देन पंखों की सहायता से वे संसार के एक क्षोर से दुसरे क्षोर तक यात्रा सुगमता पूर्वक कर लेते हैं। इनकी सबसे प्रसिद्ध यात्रा उत्तरी गोलार्द्ध से दक्षिण की तरफ की है। गृष्म काल में तो उत्तरी गोलार्द्ध का तापमान ठीक-ठीक रहता है, पर जाड़ों में ये पूरा क्षेत्र बर्फ से ढ़ंक जाता है। तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। इस क्षेत्र में पक्षियों के लिए खाने-पीने और रहने की सुविधाओं का अभाव हो जाता है। ऐसी परिस्थित में उनका जीना मुश्किल हो जाता है। फलतः वे आश्रय की तलाश में गर्म हिस्सों में प्रवास कर जाते हैं। गर्मियों में जब बर्फ़ पिघलती है और वनस्पतियां उगने लगती हैं तो भरपूर भोजन और खुले माहौल का आनंद उठाने ये फिर वापस लौट जाते हैं। पिछले सालो की तुलना में इस साल विदेशी मेहमानों की संख्या में थोड़ी कमी आई है जिसके कारण यहाँ घुमने आने वाले सैलानियों की तादाद कम हो गयी है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है। मौसम मे परिवर्तन प्रवासी पक्षियों को रास नहीं आता इस कारण वे अब मुंह मोड़ने लगे हैं जलवायु परिवर्तन से पक्षियों का प्रवास बहुत प्रभावित हुआ है। पहले पूर्वी साइबेरिया क्षेत्र के दुर्लभ पक्षी मुख्यतः साइबेरियन सारस भारत में आते थे।
जलस्रोतों के सूखने से उनके प्रवास की क्रिया समाप्त हो गई है।
ये सुदूर प्रदेशों से अपना जीवन बचाने और फलने फूलने के लिए आते रहे हैं। पर हाल के वर्षों में इनके जाल में फांस कर शिकार की संख्या बढ़ी है। कई बार तो शिकारी तालाब या झील में ज़हर डाल कर इनकी हत्या करते हैं। माना जाता है कि उनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है तथा उच्च वर्ग में इसका काफ़ी मांग होती है। अब वे चीन की तरफ जा रहे हैं। हम एक अमूल्य धरोहर खो रहे हैं। पक्षियों के प्रति लोगों में पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देना चाहिए। पक्षी विहार से लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा काफी बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों को दखने पर्यटक आते हैं। घना में करीब 29 वर्ग किलोमीटर में फैला यह राष्ट्रीय उद्यान पूरे साल सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। विदेशी पर्यटकों के लिए 200 रुपए और भारतीयों के लिए 25 रुपए प्रति व्यक्ति का टिकट है। यहां उद्यान में वाहन से शांति कुटीर तक जाने की व्यवस्था है, जो गेट से 17 किलोमीटर है। इसके लिए 50 रुपए प्रति वाहन शुल्क अलग से लगता है।
यहाँ कैसे पहुंचे :-
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान दिल्ली से १७६ किमी और जयपुर से १७६ किमी की दूरी पर है. भरतपुर आगरा , दिल्ली और जयपुर से सड़क और रेल मार्ग से भी जुड़ा हुआ है. भरतपुर रेलवे स्टेशन से पार्क की दूरी ६ किमी है
घुमने के लिए बेहतर समय:
यह राष्ट्रीयन उद्यान पुरे साल घुमने वालो के लिए खुला रहता है लेकिन प्रवासी पक्षियों के देखने के लिहाज से नवम्बर से लेकर मार्च तक का महिना उपुक्त रहता है

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