बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

 शिव और प्रेम

जब भी प्रेम की बात होती है, तो सबसे पहले श्रीकृष्ण की छवि उभरती है। वे सौंदर्य, आकर्षण और माधुर्य के प्रतीक हैं। उनकी हंसमुखता, उनकी मधुर बांसुरी, उनकी बाल सुलभ शरारतें, और उनका सहज प्रेम लोगों को मोह लेता है। राधा, गोपियां और भक्तों ने उन्हें प्रेम किया क्योंकि वे हर दृष्टि से आदर्श प्रेमी थे। उनके प्रेम में आकर्षण था, सौंदर्य था, और सबसे महत्वपूर्ण—एक निश्चितता थी कि उनका प्रेम ठुकराया नहीं जाएगा।

लेकिन शिव? वे इस प्रेम की परिभाषा से बिल्कुल अलग हैं। वे अकेले रहते हैं, गहरे ध्यान में डूबे रहते हैं, उनका पहनावा आकर्षक नहीं, बल्कि साधारण और रहस्यमयी है—बाघ की खाल, भस्म, गले में नाग। वे प्रेम का कोई आमंत्रण नहीं देते, न ही किसी को रिझाने का प्रयास करते हैं। वे गंभीर हैं, मौन हैं, और संसार से दूर अपने ही ध्यान में लीन रहते हैं।

अब सोचिए—कोई शिव से क्यों प्रेम करेगा?

कृष्ण से प्रेम करना आसान है, लेकिन शिव से प्रेम करना कठिन। कृष्ण का प्रेम सरल और सहज है, लेकिन शिव का प्रेम तपस्या मांगता है। उनका प्रेम एक परीक्षा है, जहां धैर्य, समर्पण और विश्वास की कसौटी पर प्रेमी को खुद को सिद्ध करना होता है। वे प्रेम के बदले प्रेम देंगे भी या नहीं, यह भी निश्चित नहीं। फिर भी, पार्वती ने शिव को चुना।

पार्वती जानती थीं कि शिव का प्रेम पाने के लिए उन्हें कठोर तपस्या करनी होगी। वे जानती थीं कि शिव को प्राप्त करने का मार्ग सरल नहीं है, लेकिन उनका प्रेम सच्चा था। उन्होंने वर्षों तक तप किया, कठिन साधना की, और अपने प्रेम को शिव तक पहुंचाने का हर संभव प्रयास किया। आखिरकार, उनकी श्रद्धा और समर्पण ने शिव को स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

यही प्रेम की सच्ची परीक्षा थी।

कृष्ण का प्रेम मिठास से भरा था, जहां प्रेम का उत्तर प्रेम ही था। लेकिन शिव का प्रेम एक कसौटी है, जहां प्रेमी को अपने प्रेम की सच्चाई सिद्ध करनी पड़ती है। कृष्ण अपने प्रेम को सहज रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन शिव पहले देखते हैं कि प्रेमी में धैर्य, समर्पण और विश्वास है या नहीं।

कृष्ण प्रेम में सहज रूप से आकर्षित करते हैं, जबकि शिव का प्रेम धैर्य, समर्पण और विश्वास की नींव पर स्थापित होता है। पार्वती इसी प्रेम की प्रतीक हैं, जिन्होंने अपने अटूट विश्वास और तप से शिव को प्राप्त किया। यही प्रेम का सबसे गहरा और सच्चा स्वरूप है।

इसीलिए पार्वती का प्रेम सबसे ऊँचा माना जाता है। क्योंकि उन्होंने प्रेम किसी आकर्षण, सौंदर्य या आश्वासन के कारण नहीं, बल्कि धैर्य, समर्पण और अटूट विश्वास के कारण किया। उन्होंने उस प्रेम को अपनाया, जो कठिन था, जिसमें कोई निश्चितता नहीं थी, लेकिन जो एक बार मिल जाए तो अमर हो जाता है।

कृष्ण प्रेम में बुलाते हैं। शिव प्रेम में स्वीकार करने से पहले गहराई से अनुभव करते हैं। और पार्वती प्रेम की वह परिभाषा हैं, जो धैर्य, समर्पण और विश्वास से बनी है। यही प्रेम का सबसे गहरा और सच्चा स्वरूप है।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

बीते हुए साए और अनदेखे सपने

मनुष्य का मन अजीब होता है। यह सदा उन राहों पर भटकता रहता है, जिन पर चलना असंभव है। एक राह अतीत की ओर जाती है—जहां बीते हुए पल खंडहरों की तरह खड़े हैं, और दूसरी राह भविष्य की ओर, जो अब तक आकार भी नहीं ले सका। पर मनुष्य न जाने क्यों इन्हीं दोनों दिशाओं में भागता रहता है, जबकि वह खड़ा होता है वर्तमान में।

अतीत – एक खोया हुआ संसार

नुष्य के मन में सबसे पहली इच्छा आती है—अतीत को सुधारने की। वह उन पलों को फिर से जीना चाहता है, जो हाथ से फिसल चुके हैं। वह सोचता है, काश मैंने वह गलती न की होती ! , अगर मैं उस दिन अलग फैसला लेता तो आज मेरी ज़िंदगी कुछ और होती !  वह बार-बार अपने बीते हुए समय को टटोलता है, उसके रंगों को बदलने की कोशिश करता है, लेकिन क्या यह संभव है ?

अतीत अब केवल स्मृति बन चुका है। वह अब मात्र यादों की परछाइयों में जीवित है। जैसे कोई पुरानी किताब, जिसे बार-बार पढ़कर भी उसमें कुछ नया जोड़ा नहीं जा सकता। मनुष्य अपने अतीत की गलियों में भटकता रहता है, लेकिन वह यह भूल जाता है कि वहां अब कोई दरवाजा खुला नहीं है। जो बीत गया, वह एक बंद अध्याय है—जिसे बदला नहीं जा सकता, केवल समझा जा सकता है। लेकिन मनुष्य फिर भी उसी में उलझा रहता है, जैसे रेगिस्तान में पानी की तलाश कर रहा हो

भविष्य – एक अधूरी कल्पना

दूसरी ओर, मनुष्य का मन भविष्य को पकड़ने की कोशिश करता है। वह चाहता है कि हर चीज़ उसकी योजना के अनुसार हो, कि वह पहले से जान ले कि कल क्या होने वाला है। वह हर कदम को पहले से तय कर लेना चाहता है, ताकि कोई अनहोनी न हो, कोई दुःख उसे छू न सके। लेकिन क्या भविष्य को निश्चित किया जा सकता है?


भविष्य तो एक रहस्य है, एक खुला आकाश, जिसमें अनगिनत संभावनाएं हैं। हम चाहे जितनी योजनाएं बना लें, परंतु जीवन अपने ढंग से ही घटित होता है।

मनुष्य इसी भविष्य को बांधने की कोशिश करता रहता है, और इसी कारण बेचैन रहता है। जो अभी आया ही नहीं, उस पर अधिकार जताने की कोशिश करना मानो हवा को मुट्ठी में कैद करने जैसा है—जितनी जोर से पकड़ने की कोशिश करोगे, उतनी ही तेज़ी से वह हाथ से फिसल जाएगी।

वर्तमान – जीवन का एकमात्र सत्य

मनुष्य अतीत में खोया रहता है, भविष्य में डूबा रहता है, लेकिन वह यह भूल जाता है कि वह वास्तव में अब में खड़ा है। न वह बीते कल में सांस ले सकता है, न आने वाले कल को अभी छू सकता है। उसके पास केवल यह क्षण है—यही वास्तविकता है।

जो चला गया, वह केवल एक स्मृति है। जो आने वाला है, वह केवल एक संभावना है। लेकिन जो अभी है, वह सत्य है, जीवन है। जब मनुष्य इन दो असंभवताओं से मुक्त हो जाता है, तभी वह सच में जीने लगता है। यही जीवन का रहस्य है—अतीत की पीड़ा छोड़ो, भविष्य की चिंता मत करो, बस इस क्षण को पूरी तरह जी लो।





सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

स्वाभाविकता का सौंदर्य

अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि मुझे इंसानों को परखने की समझ नहीं है। वे मानते हैं कि यह एक बड़ी कमी है, लेकिन मैं इसे अपनी सबसे खूबसूरत विशेषता मानता हूँ। परखने की प्रवृत्ति ने ही तो हमें बनावटी बना दिया है। जब हम हर चीज़ को कसौटी पर कसने लगते हैं, तो सहजता कहीं खो जाती है। क्या इस सृष्टि में कुछ भी ऐसा है जो पहले परखकर, जाँच-परखकर अपना योगदान देता है?

हवा जब बहती है, तो यह नहीं सोचती कि वह किसे छूए और किसे नहीं। वह हर किसी के लिए समान रूप से बहती है—निर्बाध, निश्छल। सूरज जब अपनी किरणें बिखेरता है, तो यह नहीं देखता कि कौन उसके प्रकाश का पात्र है और कौन नहीं। वह बस रोशनी देता है, बिना किसी भेदभाव के। वृक्ष जब फल देते हैं, तो यह नहीं तय करते कि कौन उनके योग्य है। वे बस अपनी प्रकृति के अनुसार फलते-फूलते हैं और अपने मीठे फल सबको अर्पित कर देते हैं।

माँ का प्रेम भी तो ऐसा ही होता है। वह अपने बच्चे से यह नहीं पूछती कि क्या वह उसकी ममता के योग्य है। वह बिना किसी शर्त, बिना किसी परख के, बस प्रेम करती है। धरती बिना शिकायत सब कुछ सहती है—हमारी लापरवाहियाँ, हमारे अत्याचार, हमारे स्वार्थ—फिर भी अपनी गोद में जगह देती है। और मृत्यु? वह भी कभी परखकर नहीं आती। उसके लिए कोई अमीर या गरीब नहीं होता, कोई ऊँच-नीच नहीं होता। वह सबको एक समान अपनाती है।

फिर हम इंसान क्यों हर चीज़ को परखने में लगे रहते हैं? हमने अपने रिश्तों में, अपने भावनाओं में, अपने प्रेम में इतनी शर्तें जोड़ ली हैं कि सबकुछ बनावटी सा लगने लगा है। हमने सहजता को खो दिया, निश्छलता को पीछे छोड़ दिया। अब प्रेम भी परखकर किया जाता है, दोस्ती भी जाँची जाती है, रिश्तों को भी सौदे की तरह तौला जाता है। क्या हमने कभी सोचा कि अगर प्रकृति भी हमें परखती, तो क्या हम उसके योग्य होते?

शायद हमें हवा, सूरज, वृक्ष, माँ, धरती और मृत्यु से सीखना चाहिए। हमें भी देना आना चाहिए, बिना शर्त, बिना परख के। अगर हम भी इस जीवन को स्वाभाविकता से जीना सीख जाएँ, तो शायद रिश्ते आसान हो जाएँ, प्रेम सच्चा हो जाए, और जीवन कहीं अधिक सुंदर हो जाए।

रविवार, 23 फ़रवरी 2025

ईमानदारी का दर्पण

ईमानदारी के दो स्तर होते हैं। पहली ईमानदारी वह है, जो हम दूसरों के प्रति रखते हैं—सामाजिक, व्यवहारिक, और बाहरी। यह ईमानदारी जरूरी तो है, लेकिन यह बहुत बड़ी नहीं, बल्कि सतही और औपचारिक होती है। इसकी परीक्षा जीवन के छोटे-छोटे निर्णयों में होती है, और अधिकांश लोग इसे निभाने की कोशिश भी करते हैं।

लेकिन एक दूसरी ईमानदारी भी होती है—अत्यंत गहरी, आत्मिक, और वास्तविक। यह वह ईमानदारी है, जो व्यक्ति अपने स्वयं के प्रति रखता है। इसे खोजना और निभाना कहीं अधिक कठिन है। पहली ईमानदारी तक पहुँचना ही कठिन है, और दूसरी तक पहुँचना तो उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण।

अपने प्रति ईमानदार होना इतना दुष्कर क्यों है? क्योंकि हम सबने अपने बारे में कुछ धारणाएँ, कुछ सुंदर छवियाँ गढ़ रखी हैं। हमने स्वयं को एक निश्चित रूप में देखने की आदत बना ली है, जो अक्सर वास्तविकता से परे होती है। अगर हम अपने प्रति पूर्णतः ईमानदार हो जाएँ, तो ये बनाई हुई प्रतिमाएँ हमारे ही हाथों ढह जाएँगी। हम जो अपने बारे में सोचते हैं, अक्सर वैसा होते नहीं हैं। और जो सच में हैं, उससे आँख मिलाने का साहस भी नहीं जुटा पाते।

हमारी असली सच्चाई, हमारा वास्तविक स्वरूप—शायद इतना असहज, इतना कठिन, और कभी-कभी पीड़ादायक भी हो सकता है कि उसे स्वीकारने की हिम्मत हममें नहीं होती। हम अपने भीतर झाँककर देखने से कतराते हैं, क्योंकि वहाँ हमें अपनी कमजोरियाँ, अपनी असफलताएँ, और अपने ही बनाए भ्रम टूटते हुए दिखते हैं।

लेकिन सच्चे धार्मिक जीवन की यात्रा वहीं से शुरू होती है, जहाँ व्यक्ति अपने प्रति पूरी तरह ईमानदार होता है। जब वह अपने वास्तविक स्वरूप को बिना किसी भय, संकोच, या आडंबर के स्वीकार करता है—जैसा वह सच में है, न कि जैसा दिखना चाहता है। चाहे भीतर कितनी भी विकृतियाँ हों, चाहे कितनी भी गहरी अंधेरी परछाइयाँ हों, चाहे कितनी भी उलझनें और मनोव्याधियाँ क्यों न हों—जो व्यक्ति स्वयं को पूरी निडरता के साथ देख सकता है और स्वीकार कर सकता है, वही आध्यात्मिक रूप से विकसित हो सकता है।

पासवर्ड

जिस तारीख को कभी फूलों से सजाया था,
आज वही बस स्क्रीन पर कोड बन के आया है।
कभी उम्मीदों की रोशनी में चमकता था,
अब बस उंगलियों के स्पर्श से खुल जाता है।
पहले इस दिन की धड़कनें तेज़ होती थीं,
अब कोई हलचल भी नहीं होती अंदर!
कभी दुआओं में नाम तेरा शामिल था,
अब बस एक भूला-बिसरा नंबर।
वक्त ने लम्हों के मायने बदल दिए,
यादें अब भी हैं, बस शक्ल बदल गई,
जो दिन कभी खास हुआ करता था,
आज बस एक पासवर्ड में बंद हो गई!

गिरफ़्तार

 

खिड़की की सलाख़ों से टिका मेरा चेहरा,
सामने चाँद, पेड़ों के झुंड में ठहरा।
रुका है जैसे थककर कोई राहगीर,
या बंध गया हो वक़्त की ज़ंजीर।
मैं बंद कमरे में या चाँद है क़ैद,
दोनों पर पहरा, दोनों बेबस और नासेह।
एक दीवार के इस पार,
दूसरा दीवार के उस पार।
रात का सन्नाटा अंदर भी, बाहर भी,
हवा तक थमी है सहमी-सहमी।
पेड़ चुप हैं, पहाड़ भी ख़ामोश,
शायद सब हैं इस कैद में मदहोश।
चाँद देखता मुझे, मैं देखूँ उसे,
दोनों आँखों में है इक ही गिले।
कौन ज्यादा आज़ाद, कौन ज्यादा गिरफ़्तार?
कमरे के अंदर मैं या बाहर चाँद लाचार?


सहर की आहट और परिंदों का कारवां

सुबह की पहली 'किरण' ने जब कमरे की देहलीज़ पर हल्की-सी दस्तक दी, तो ऐसा लगा जैसे कोई भूली-बिसरी याद रूह को छूकर गुज़र गई हो। हवा में घुली ताज़गी में एक मीठी कशिश थी—जैसे वक़्त ठहरकर कोई पुराना अफ़साना सुनाने आया हो। नर्म-ओ-नाज़ुक रोशनी जब दीवारों से लिपटी, तो उनका रंग और भी गहरा हो गया—जैसे कोई भूली-बिसरी याद हल्के से सांस लेकर फिर से ज़िंदा हो उठी हो।

तभी, आसमान में परवाज़ भरता परिंदों का एक कारवां कमरे में दाख़िल हुआ। वे किसी अल्हड़ उम्मीद की तरह भीतर चले आए—बेपरवाह, आज़ाद, और अपनी ही धुन में मगन। कोई किताबों पर बैठा, तो कोई शीशे के सामने ठहरकर खुद से बातें करने लगा। एक परिंदा पूजा की थाली के पास उतरा और नन्ही चोंच से प्रसाद के टुकड़े चुनने लगा, जैसे किसी पाक बरकत की तलाश में हो। उनकी मासूम चहचहाहट में एक अजीब-सी बेख़ुदी थी, मानो ज़िंदगी ने एक पल के लिए अपना संगीत छेड़ दिया हो। हवा में उनके पंखों की हल्की सरसराहट ने माहौल को और नूरानी बना दिया।

कुछ लम्हों तक यह कारवां ठहरा, फिर अचानक जैसे कोई ख़्वाब आंखों से फिसल जाए, वैसे ही सब फिर से आसमान की जानिब उड़ चले। लेकिन उनकी आमद कमरे में एक अजीब-सी रूहानी रोशनी छोड़ गई—जैसे किसी बिछड़े हुए अपने की महक देर तक महसूस होती रहे। सुबह अब पहले से ज्यादा हसीं और पुरसुकून लगने लगी थी—जैसे ज़िंदगी फिर से उम्मीद के पर फैला रही हो।

राहुल 

9 फरवरी 2025 

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

अकबरपुर: मेरे बचपन की गलियां


बिहार के नवादा जिले का छोटा सा कस्बा अकबरपुर, जो विकास की दौड़ में भले ही पीछे रह गया हो, लेकिन अपनापन, प्यार और सादगी में अब भी अव्वल है। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन नहीं बदलीं यहाँ की संकरी गलियाँ, तालाब की ठहरी हुई शांति, और लोगों का आत्मीय व्यवहार। शायद यही कारण है कि यह कस्बा मेरे दिल के सबसे करीब है।

बचपन की यादें और दोस्ती की शरारतें

मेरा बचपन यहाँ की मिट्टी में खेलते-कूदते बीता। स्कूल के दिन, दोस्त संदीप और कोशलेंद्र के साथ की गई शैतानियाँ, और क्लास में बात-बात पर होने वाले झगड़े—ये सब यादें अब भी जेहन में ताजा हैं। स्कूल की चारदीवारी के पीछे तालाब किनारे बैठकर घंटों गप्पें मारना, और अगर समय बच जाता तो नदी के किनारे ढेला फेंकने की प्रतियोगिता करना, ये सब बचपन की नायाब खुशियाँ थीं।

बिच बाजार में जैबा मैया की मिठाई की दुकान हुआ करती थी, जहाँ हमारे मिडिल स्कूल के सभी शिक्षकों का खाता चलता था। शिक्षक सुबह-शाम चाय पीते और महीने के अंत में वेतन मिलने पर पैसे चुकाते। हॉस्टल में रहने वाले कुछ शरारती छात्र कभी-कभी मिठाई खाकर किसी और के खाते में पैसा लिखवा देते और चुपचाप चलते बनते। ये छोटी-छोटी बातें ही उस समय की मासूमियत और मज़े का हिस्सा थीं।

नाना जी और स्कूल के दिन

मैंने अपने बचपन के पाँच साल इसी छोटे से कस्बे में गुजारे। अकबरपुर बिहार और झारखंड के बॉर्डर पर बसा हुआ है और कभी इसे विकास के नाम पर बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका माना जाता था। मुख्य सड़क से करीब पाँच किलोमीटर दूर बसे इस कस्बे में मेरे नाना जी 1975 से मिडिल स्कूल में शिक्षक थे, और बचपन में मैं उन्हीं के साथ रहता था। आज की तरह दाखिले के लिए लंबी दौड़ नहीं लगानी पड़ी, न ही किसी इंटरव्यू या डोनेशन की जरूरत पड़ी। नाना जी ने बस अपने स्कूल में मेरा नाम लिखवा दिया, और महज 30 रुपये में मेरा दाखिला हो गया। स्कूल में हॉस्टल तो नहीं था, लेकिन शिक्षकों के लिए रेजिडेंस मिला हुआ था, इसलिए मैं भी नाना जी के साथ वहीं रहा करता था।

पढ़ाई के सख्त नियम और गणित की जंग

सुबह तीन बजे उठकर पढ़ाई करना, मानो अगर एक घंटा पढ़ लिया तो विवेकानंद बन जाऊँगा! पढ़ने को लेकर सख्त शर्तें थीं—बिस्तर पर नहीं, बल्कि बोरा बिछाकर ज़मीन पर बैठकर पढ़ना, और ज़ोर से आवाज़ में पढ़ाई करना ताकि खुद को सुनाई दे। ये नियम उस समय मुश्किल लगते थे, लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है कि वे अनुशासन सिखाने के तरीके थे।

दिन के उजाले के साथ दूसरी जंग शुरू होती थी—गणित से लड़ाई! ट्यूशन पढ़ने जाना अनिवार्य था, और हमारे मास्टर साहब अक्सर झल्लाकर कहते, "तुम्हारे दिमाग़ में भूसा भरा है या गणित के लिए कोई जगह बची भी है?" आज जब सोचता हूँ कि जिंदगी में जोड़, गुणा और भाग से ही काम चल जाता है, तो समझ नहीं आता कि वर्गमूल, साइन थीटा, कॉस थीटा वगैरह क्यों पढ़ाया जाता था।

बदलते समय के साथ अकबरपुर का वही अपनापन

समय बदला, विकास की लहरें धीरे-धीरे इस कस्बे तक भी पहुँचीं, लेकिन जो चीज़ें नहीं बदलीं, वे हैं यहाँ के लोगों का अपनापन, तालाब का ठहराव, और उन सकरी गलियों में बसी बचपन की यादें। आज भी जब मैं अकबरपुर की उन्हीं गलियों से गुजरता हूँ, तो लगता है कि बचपन अब भी वहाँ किसी मोड़ पर खड़ा मुझे देख रहा है। शायद यही वजह है कि यह कस्बा मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि मेरी यादों का गुलदस्ता है।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

ले जा सब ले जा

ले जा सब ले जा, सब तेरा है

ये जो रात है, ये जो मेरा सवेरा है
हाथ की हथेली से लकीर ले जा
मेरी ज़मीन, मेरा ज़मीर ले जा

72 से हुई 78 धड़कन
ले दिल-ए-अमीर ले जा
ले जा सब ले जा, सब तेरा है

जो ख्वाब अधूरे थे, पूरे कर ले
जो अश्क़ बहे थे, वो चुरा ले
जो लफ्ज़ सिमट न सके होंठों पर
उनको भी हवाओं में उड़ा ले

मेरी उदासियों का सवेरा ले जा
दिल की हर बात का बसेरा ले जा
जो धूप से जलती थी खिड़कियाँ
उन पर छाई हुई शाम ले जा

ले जा सब ले जा, सब तेरा है
ये जो साँस है, ये जो मेरा बसेरा है
जो बाकी था, अधूरा था
वो आखिरी मुकाम ले जा

अब न कुछ मेरा, न कुछ तेरा
अब जो भी है, वो बस हवा का डेरा
उसी में मेरी पहचान घुली
ले जा सब ले जा, सब तेरा है...



शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

म्यांमार में लोकतंत्र का आगाज

भारत का पड़ोसी देश म्यांमार, जो 1991 तक बर्मा के नाम से जाना जाता था, धीरे-धीरे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। ऐसा वहां की संसद की 45 सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों से प्रतीत होता है। बर्मा की आजादी के जननायक जनरल आंग सान की पुत्री है सू की . 1947 में आजादी से महज छह महीने पहले ही सान की हत्या कर दी गयी थी. उस वक्त सू की की उम्र सिर्फ दो साल थी. 1960 में वह अपनी मां के साथ भारत चली आयीं, जहां उनकी मां को म्यांमार का राजदूत नियुक्त किया गया था।
भारत में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडीश्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. चार साल तक भारत रहने के बाद वह ब्रिटेन चली गयीं, जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की. इसके बाद, 1988 में वह रंगून लौटीं. यह वह अवधि था, जब म्यांमार जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था. हजारों छात्र और बौद्ध देश में लोकतांत्रिक सुधार को लेकर जगह-जगह विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. 26 अगस्त 1988 को दिये अपने भाषण में उन्होंने खुद कहा, अपने महान पिता की बेटी होने के कारण मैं खुद को इन सबसे अलग नहीं कर पायी. इस तरह सू की म्यामांर की राजनीतिक उथल-पुथल में शामिल हो गयीं. उन्होंने तत्कालीन तानाशाह जनरल विन के खिलाफ प्रदर्शनकारियों का मोर्चा संभाल लिया.इस तरह से दशकों बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत वहां चुनाव हुए उससे तो यही कहा जा सकता है कि यह एक अथक संघर्ष की जीत है. म्यांमार को सैन्य शासन से लोकतंत्र की इस दहलीज पर लाने में नेता आंग सान सू की की भूमिका को नजरअंदाज एक इतिहास से नजरें चुराने जैसा होगा. अगर देखें तो नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की दक्षिणी अफ्रीकी नेता नेल्सन मंडेला की तरह एक शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन चुकी हैं। 1990 में बर्मा में स्वतंत्र चुनाव हुए थे, जिनमें सू की की पार्टी को जीत हासिल हुई थी लेकिन सैनिक तंत्र ने इसे नहीं माना। सेना खुद सत्ता पर काबिज रही। बर्मा के संविधान के अनुसार 664 सदस्यों वाली राष्ट्रीय असेंबली में दो तिहाई सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं। सेना ने पिछले साल फिर चुनाव कराये जिनका सू की की पार्टी ने बहिष्कार किया। लेकिन सेना ने नरम रुख अख्तियार करते हुए सिविलियन सरकार को सत्ता सौंप दी थी। फिर भी असली कमान सेना के ही हाथ में रही। बर्मा के राष्ट्रपति स्वयं एक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं। संसद की 45 सीटों के लिए उपचुनाव इसलिए कराने पड़े क्योंकि बर्मा के संविधान के अनुसार कोई मंत्री संसद सदस्य नहीं हो सकता। सेना में सेना समर्थित पार्टी यू.एस.डी.पी. का पहले से ही बहुमत है। वर्षों नजरबंद रहने वाली बर्मा की लोकप्रिय जन नेता सू की अपनी पार्टी की मात्र 10 प्रतिशत सीटों के बल पर कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पायेगी। सैन्य शासन के कारण पश्चिमी देशों की तरफ से बर्मा पर कई तरह के आर्थिक व अन्य प्रतिबंधों के कारण बर्मा के सैन्य तंत्र को दबाव में झुकना पड़ा। फिर भी यह मानना पड़ेगा कि बर्मा ने लोकतंत्र की दहलीज पर पांव रख दिये हैं। बर्मा भारत का एक ऐसा पड़ोसी देश है जो 1937 तक भारत का ही एक अंग था, भारत अब यह उम्मीद कर सकता है कि बर्मा में उल्फा और नगा विद्रोहियों के कैंपों को समेटने में सू की के प्रभाव से कुछ मदद मिलेगी और वहां की सरकार भारत के साथ अपने संबंधों को सुधारने की ओर प्रयासरत होगी। बर्मा में अब सबसे ज्यादा जरूरी है संविधान संशोधन ताकि वहां आम चुनाव का रास्ता साफ किया जा सके।


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